गोल्ड और महंगा होगा, इस साल के अंत तक
- Aabhushan Times
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गोल्ड के वैश्विक जानकार कहते हैं कि साल 2026 के अंत तक गोल्ड के और महंगा होने के आसार हैं। इंटरनेशनल लेवल पर विभिन्न देशों के बीच के संबंध लगातार खराब होने जारी हैं। कुछ देश गोल्ड लगातार खरीद रहे हैं। तो रेट बढऩे जायज ही है।
दुनिया की अर्थव्यवस्था इस समय कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रही है। एक ओर पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल से जुड़े तनाव तथा युद्ध की आशंकाएं हैं, तो दूसरी ओर अमेरिका की आर्थिक नीतियां, डॉलर की मजबूती, बढ़ता सरकारी कर्ज और ऊर्जा संकट वैश्विक वित्तीय बाजारों को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे माहौल में गोल्ड एक बार फिर निवेशकों की पहली पसंद बनता दिखाई दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय बुलियन बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में गोल्ड की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है। गोल्ड मार्केट के वैश्विक जानकारों का अनुमान है कि वर्ष 2026 के अंत तक गोल्ड 5,800 अमेरिकी डॉलर प्रति औंस के नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है। यह अनुमान केवल बाजार की अटकलों पर आधारित नहीं है, बल्कि वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। गोल्ड का गहन अध्ययन करने वाले कुछ विशेषज्ञों ने लगातार खराब होते हालात तथा दुनिया के कई देशों की बिगडती अर्थव्यवस्था के कारण सन 2030 के अंत तक तक गोल्ड के 10 हजार अमेरिकी डॉलर प्रति औंस तक पहुंचने की संभावना भी व्यक्त की है। हालांकि यह अनुमान चार साल बाद का है, लेकिन ताजा हालात में इउस साल के अंत तक गोल्ड 5,800 अमेरिकी डॉलर प्रति औंस के नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है। गोल्ड में तेजी के कारण यह भी है कि एक तो इस पर इंपोर्ट ड्यूटी में की गई 15 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी और डॉलर के मुकाबले रुपये में आई तेज गिरावट। इतिहास गवाह है कि जब भी दुनिया किसी बड़े युद्ध, आर्थिक संकट या राजनीतिक अस्थिरता से गुजरती है, निवेशक जोखिम भरे निवेशों से निकलकर गोल्ड की ओर रुख करते हैं। इसका कारण यह है कि गोल्ड को सुरक्षित निवेश या सेफ हेवन एसेट माना जाता है। ईरान से जुड़े तनावों और पश्चिम एशिया में बढ़ती अनिश्चितताओं ने तेल बाजार में भी अस्थिरता पैदा की है। यदि क्षेत्रीय संघर्ष लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे तेल की कीमतों में तेजी आएगी। तेल महंगा होने से दुनिया भर में महंगाई बढ़ेगी और आर्थिक विकास की गति धीमी होगी। ऐसी स्थिति को अर्थशास्त्र की भाषा में स्टैगफ्लेशन कहा जाता है। स्टैगफ्लेशन के दौर में गोल्ड आमतौर पर मजबूत प्रदर्शन करता है क्योंकि निवेशक अपनी संपत्ति को महंगाई और आर्थिक जोखिमों से बचाने के लिए गोल्ड में निवेश बढ़ा देते हैं। जनवरी, 2026 के अंत तक तक, भारत में 24 कैरेट गोल्ड के रेट लगभग 1 लाख 80 हजार रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास पहुंच गए थे, और वर्तमान में गोल्ड 1.5 लाख के आसपास है। तो, वैश्विक स्तर के कई भू-राजनीतिक तनावों के बीच गोल्ड ने विभिन्न कारणों से महत्वपूर्ण तेजी के बाद थोड़ी सी मंदी भी देखी हैं। लेकिन ताजा दौर तेजी का है। विभिन्न सर्वेक्षण के निष्कर्षों के अनुसार, गोल्ड की कीमतों में निरंतर तेजी ने वित्त वर्ष 2025 में आयात में 27.4 प्रतिशत की वृद्धि की, जो अब भी जारी रहने की संभावना है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक नीतियां भी गोल्ड की कीमतों को प्रभावित कर रही हैं। ट्रंप प्रशासन घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने, आयात शुल्क बढ़ाने और बड़े पैमाने पर सरकारी खर्च के पक्ष में रहा है। इन नीतियों का एक प्रभाव यह है कि अमेरिकी सरकारी कर्ज लगातार बढ़ रहा है। आज अमेरिका का राष्ट्रीय ऋण ऐतिहासिक ऊंचाइयों पर पहुंच चुका है। जब किसी देश का कर्ज तेजी से बढ़ता है तो निवेशकों के मन में उसकी मुद्रा की दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर सवाल खड़े होने लगते हैं। यही कारण है कि दुनिया भर के केंद्रीय बैंक और बड़े निवेशक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में गोल्ड की हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं। हालांकि वर्तमान में अमेरिकी डॉलर अपेक्षाकृत मजबूत बना हुआ है, लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय में डॉलर पर दबाव बढ़ सकता है। यदि डॉलर कमजोर होता है तो गोल्ड की कीमतों को अतिरिक्त समर्थन मिलेगा क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गोल्ड का कारोबार डॉलर में होता है। ऐसे में गोल्ड पर भारत सरकार द्वारा बढ़ाई गई इंपोर्ट ड्यूटी भी एक बहुत बड़ा कारण है। भारत सरकार द्वारा गोल्ड पर इंपोर्ट ड्यूटी में की गई अचानक 9 प्रतिशत की शुल्क बढ़ोतरी का सीधा झटका भारतीय ज्वेलरी कारोबारियों और इंपोर्टरों की जेब पर लगा, जिसका पूरा बोझ अंतत: ग्राहकों पर ट्रांसफर होता है। इस इंपोर्ट ड्यूटी बदलाव का असर कितना तेज था, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि 6 मई से 12 मई के बीच गोल्ड की कीमतें करीब 1.5 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम थी, लेकिन इंपोर्ट ड्यूटी बढऩे की घोषणा होते ही 14 मई को गोल्ड 1 लाख 60 हजार रुपए प्रति 10 ग्राम के नए हाई स्तर पर जा पहुंचा।
पिछले कुछ वर्षों में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह देखने को मिला है कि दुनिया के केंद्रीय बैंक रिकॉर्ड मात्रा में गोल्ड खरीद रहे हैं। विशेष रूप से चीन, भारत, रूस, तुर्किये और मध्य-पूर्व के कई देशों ने अपने भंडार में लगातार गोल्ड जोड़ा है। इन देशों की रणनीति स्पष्ट है। वे केवल डॉलर आधारित वित्तीय प्रणाली पर निर्भर नहीं रहना चाहते। भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक प्रतिबंधों की संभावनाओं ने कई देशों को अपने विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा गोल्ड में रखने के लिए प्रेरित किया है। जब केंद्रीय बैंक बड़ी मात्रा में गोल्ड खरीदते हैं तो बाजार में मांग बढ़ती है और कीमतों को मजबूती मिलती है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में गोल्ड ने लगातार नए रिकॉर्ड बनाए हैं। वल्र्ड गोल्ड कौंसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में गोल्ड की कीमतों में आई इस साल की लगभग 18 प्रतिशत की भारी तेजी के दो बड़े कारण हैं, जिसमें एक तो हैं सरकार द्वारा गोल्ड के इंपोर्ट ड्यूटी में की गई भारी बढ़ोरती और दूसरा है डॉलर के मुकाबले रुपये में आई तेज गिरावट।
गोल्ड के वैश्विक जानकारों की राय में, लंबी अवधि में गोल्ड में तेजी का रुझान तय दिख रहा है, लेकिन बीच-बीच में मुनाफावसूली या अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की घोषणा होने पर सोने में अस्थायी गिरावट भी देखी जा सकती है। कारण केवल एक ही है कि गोल्ड की मांग केवल निवेश तक सीमित नहीं है। ज्वेलरी इंडस्ट्री, तकनीकी उपकरणों और केंद्रीय बैंकों की खरीद भी इसकी मांग को बढ़ाती है। गोल्ड एक रणनीतिक परिसंपत्ति के रूप में स्थापित हो गया है। यही वजह है कि कई अंतरराष्ट्रीय निवेश संस्थान अपने पोर्टफोलियो में गोल्ड की हिस्सेदारी बढ़ाने की सलाह दे रहे हैं। इसी सलाह पर अमल करते हुए चीन लगातार अपने गोल्ड रिजर्व को बढ़ा रहा है और कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सिर्फ निवेश नहीं, बल्कि एक बड़ी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। आने वाले समय में गोल्ड की भूमिका और मजबूत होगी। इतिहास गवाह है कि जब बड़े देश किसी संपत्ति को लगातार जमा करते हैं, तो उसके पीछे कोई न कोई दीर्घकालिक सोच जरूर होती है। ऐसे में गोल्ड बिजनेस से जुड़े लोगों के लिए यह समझना जरूरी है कि दुनिया की आर्थिक दिशा बदल जा रही है, तो गोल्ड का महंगा होना तो लाजिमी ही है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ता देशों में से एक है। भारतीय परिवारों के पास हजारों टन गोल्ड मौजूद है और इसे केवल निवेश नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संपत्ति के रूप में भी देखा जाता है। भारतीय बाजार में गोल्ड की कीमतें दो वजहों से प्रभावित होती हैं एक तो है अंतरराष्ट्रीय कीमतें और दूसरा है डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति। यदि वैश्विक बाजारों में गोल्ड महंगा होता है और साथ ही रुपया कमजोर होता है तो भारतीय उपभोक्ताओं के लिए गोल्ड और अधिक महंगा हो जाता है। हाल के वर्षों में भारतीय रिजर्व बैंक ने भी अपने स्वर्ण भंडार में लगातार वृद्धि की है। यह संकेत है कि भारत भी वैश्विक रुझान के अनुरूप अपने विदेशी मुद्रा भंडार में गोल्ड की भूमिका को मजबूत कर रहा है। वल्र्ड इकॉनोमी के विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी अवधि में भारतीय निवेशकों के लिए गोल्ड अभी भी एक महत्वपूर्ण परिसंपत्ति बना रहेगा, विशेषकर तब जब वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता बनी रहे। कुछ विशेषज्ञों ने भविष्य में अर्थात 2030 के अंत तक गोल्ड के 10,000 डॉलर प्रति औंस तक पहुंचने की संभावना भी व्यक्त की है। अगर ऐसा होता है तो भारतीय बाजार में गोल्ड 3.5 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम तक भी पहुंच सकता है। हालांकि यह अभी आधारभूत अनुमान नहीं है, लेकिन इसे पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। यदि वैश्विक निवेशकों का बड़ा हिस्सा शेयर बाजारों से निकलकर गोल्ड की ओर जाता है, अमेरिकी कर्ज और बढ़ता है, तथा डॉलर की स्थिति कमजोर होती है, तो गोल्ड अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है। वर्तमान में गोल्ड का वैश्विक बाजार मूल्य दुनिया के कुल शेयर बाजार मूल्य का लगभग 20 प्रतिशत है। इतिहास में यह अनुपात 40 प्रतिशत तक भी पहुंच चुका है। यदि ऐसी स्थिति दोबारा बनती है तो गोल्ड की कीमतों में भारी उछाल संभव है।
आज की परिस्थितियों में गोल्ड केवल आभूषण या परंपरागत बचत का माध्यम नहीं रह गया है। यह वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, बढ़ते सरकारी कर्ज, डॉलर पर दबाव, तेल संकट और भू-राजनीतिक तनावों के खिलाफ सुरक्षा कवच के रूप में उभर रहा है। डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक नीतियों, अमेरिकी ऋण के विस्तार, केंद्रीय बैंकों की रिकॉर्ड खरीद और मध्य-पूर्व के तनावों ने गोल्ड के लिए दीर्घकालिक सकारात्मक वातावरण तैयार किया है। निकट अवधि में कीमतों में उतार-चढ़ाव संभव है, लेकिन अधिकांश विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि आने वाले वर्षों में गोल्ड वैश्विक निवेश परिदृश्य का एक प्रमुख स्तंभ बना रहेगा। इसलिए निवेशकों के लिए यह समझना आवश्यक है कि गोल्ड केवल संकट के समय की शरणस्थली नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संपत्ति संरक्षण का एक महत्वपूर्ण साधन भी बन चुका है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक बाजार में गोल्ड की मूल कीमत हमेशा अमेरिकी डॉलर में ही तय की जाती है, इसलिए जब भी रुपया कमजोर होता है, तो भारतीय बैंकों और इंपोर्टर्स को उतना ही गोल्ड खरीदने के लिए पहले से कहीं अधिक रुपये खर्च करने पड़ते हैं, तो महंगा होना वाजिब है।


गोल्ड और महंगा होगा, क्योंकि वर्तमान समय में तीन बड़े कारण गोल्ड के महंगा होने के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं। जिनमें सबसे पहला कारण है वैश्विक राजनीतिक अस्थिरता। दूसरा, बढ़ती महंगाई और सरकारी कर्ज, तथा तीसरा कारण है डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था पर घटता भरोसा।


अंतरराष्ट्रीय बाजार में गोल्ड की खरीदी आने वाले समय में और बढ़ती हैं तथा रुपया भी अपनी कमजोरी जारी रखता है, तो भारत में गोल्ड के भाव और बढ़ेंगे। लेकिन इससे ज्वेलर्स की परेशानी बढ़ेगी क्योंकि ज्वेेलरी की खरीदी तेजी से घट रही है तथा कमाई भी नीचे आ रही है।


यदि वैश्विक स्तर पर गोल्ड की कीमतों में कुछ गिरावट आती भी है, तो भी भारत में रुपये की कमजोरी उस गिरावट के फायदे की भरपाई नहीं करेगी। क्योंकि टूटता रुपया गोल्ड की घरेलू कीमतों को ज्यादा नीचे नहीं आने देगा, इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने भी चिंता जाहिर की है।










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