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ज्वेलरी बिजनेस पर मंदी की मार

  • Aabhushan Times
  • 13 minutes ago
  • 7 min read

वैश्विक स्तर पर खराब होते आर्थिक हालात और तेजी से बढञ रही महंगाई की मार से ज्वेलरी सेक्टर दोहरे दबाव में है। ज्वेलरी बिजनेस पर संकट का साया मंडरा रहा है। वल्र्ड इकॉनोमिक फोरम की र्पोर्ट कहती है कि आने वाले कम से कम दो साल तक तो दुनिया के आर्थिक हालात सुधरने आसान नहीं है।


भारत में ज्वेलरी इंडस्ट्री को देश की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। गोल्ड, सिल्वर, डायमंड और प्लेटिनम ज्वेलरी का कारोबार न केवल घरेलू मांग पर आधारित है, बल्कि यह भारत के एक्सपोर्ट क्षेत्र का भी एक बड़ा आधार है। लेकिन पिछले कुछ महीनों से देश के अधिकांश ज्वेलरी मार्केटेस में ग्राहकी कम हुई है। शादी-ब्याह और त्योहारों के मौसम में भी खरीदारी उम्मीद के अनुरूप नहीं रही। इंडस्ट्री से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दो वर्ष इस क्षेत्र के लिए सबसे कठिन साबित हो सकते हैं। लाखों ज्वेलर्स सहित ज्वेलरी कारीगरों, निर्माताओं, एक्सपोर्टकों और विभिन्न व्यापारियों की आजीविका इस इंडस्ट्री से जुड़ी हुई है। परंतु वर्तमान समय में वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, बढ़ती महंगाई, इंटरनेशनल संघर्षों और उपभोक्ताओं की घटती क्रय शक्ति के कारण ज्वेलरी इंडस्ट्री अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रहा है। ज्वेलरी  एक्सपोर्ट में गिरावट का सबसे बड़ा कारण वैश्विक मंदी के संकट का असर माना जा रहा है। आर्थिक मंदी की चेतावनी सामने खड़ी है और ज्वेलरी इंडस्ट्री की चिंताएं बढ़ रही हैं, क्योंकि  सवाल लाखों परिवारों की रोटी - रोटी पर संकट से जुड़ा है। अगले दो वर्ष को सबसे कठिन दौर बताया जा रहा है, यह चिंता का सबसे बड़ा विषय है। 


यदि वैश्विक और घरेलू आर्थिक हालात में सुधार नहीं हुआ, तो ज्वेलरी इंडस्ट्री पर इसका असर और गहरा हो सकता है। ज्वेलरी  बिजनेस में गिरावट का सबसे बड़ा कारण वैश्विक मंदी के असर को ही माना जा रहा है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा गोल्ड और डायमंड ज्वेलरी निर्माण एवं एक्सपोर्ट केंद्र माना जाता है। हर वर्ष भारत से हजारों करोड़ रुपये मूल्य की ज्वेलरी अमेरिका, यूरोप, मध्य-पूर्व और एशिया के विभिन्न देशों में एक्सपोर्ट की जाती है। लेकिन हाल के महीनों में वैश्विक मांग में कमी के कारण भारतीय ज्वेलरी एक्सपोर्ट में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिल रही है। इंटरनेशनल मार्केट्स में आर्थिक मंदी की आशंका बढऩे से उपभोक्ताओं ने लक्जरी वस्तुओं पर खर्च कम कर दिया है। अमेरिका और यूरोप जैसे प्रमुख मार्केट्स में ज्वेलरी की डिमांड कमजोर हुई है। इसके अलावा रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव तथा अन्य वैश्विक संघर्षों ने व्यापारिक गतिविधियों को प्रभावित किया है। इन परिस्थितियों के कारण इंटरनेशनल खरीदार नए ऑर्डर देने में सावधानी बरत रहे हैं। एक्सपोर्ट में कमी का सीधा असर भारत के सूरत, मुंबई, जयपुर और कोलकाता जैसे ज्वेलरी उत्पादन केंद्रों पर पड़ रहा है। कई एक्सपोर्ट कंपनियों को उत्पादन घटाना पड़ा है। यदि वैश्विक हालात जल्द नहीं सुधरे तो आने वाले समय में भारतीय ज्वेलरी इंडस्ट्री के लिए विदेशी मार्केटेस में प्रतिस्पर्धा बनाए रखना और भी कठिन हो सकता है।


ज्वेलर्स काफी हद तक हैरान हैं तथा ज्वेलरी सेक्टर में ग्राहकी की लगातार गिरावट से सभी परेशान हैं। देश में गोल्ड, सिल्वर और डायमंड ज्वेलरी का कारोबार इस समय मंदी के दबाव में है। पिछले दो महीनों से बाजार में ग्राहकों की संख्या लगातार घट रही है और व्यापारियों के अनुसार यह गिरावट आगे भी जारी रह सकती है। ज्वेलरी व्यापारियों का कहना है कि आर्थिक अनिश्चितता ने उपभोक्ताओं के मन में डर पैदा कर दिया है। लोग कैश बचाकर रखना चाहते हैं और अनावश्यक खर्चों से बच रहे हैं। यदि यही स्थिति बनी रही तो अगले दो वर्षों में ज्वेलरी इंडस्ट्री को बिक्री, निवेश और रोजगार तीनों स्तरों पर भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। आम आदमी के लिए ज्वेलरी हमेशा से एक जरूरत का खर्च न होकर निवेश सहित अतिरिक्त धन के होने पर किए जाने वाले खर्च का रूप मानी जाती है। मंदी की मार झेल रहे लोग अपनी आय का बड़ा हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य, ईंधन, बिजली और खाद्य पदार्थों पर खर्च कर रहे हैं। ऐसे में महंगी ज्वेलरी खरीदना उनके लिए कठिन हो गया है। ज्वेलर्स के शोरूम में आने वाले ग्राहकों की संख्या कम हो रही है और जो ग्राहक आते भी हैं, वे पहले की तुलना में कम कीमत के उत्पादों की मांग कर रहे हैं।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ वर्ष पहले देशवासियों से सोने के आयात को कम करने और निवेश के वैकल्पिक साधनों को अपनाने की अपील की थी। उस समय इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा पर दबाव कम करना था, लेकिन वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में इसे आर्थिक सतर्कता के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। आज जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों से गुजर रही है, तब भारत भी उससे पूरी तरह अछूता नहीं है। इंडस्ट्री विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक सुस्ती का प्रभाव आम लोगों की क्रय शक्ति पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। बढ़ती महंगाई और सीमित आय वृद्धि के कारण लोग बड़े खर्चों को टाल रहे हैं। इसका सीधा असर ज्वेलरी बिक्री पर पड़ रहा है। द जेम एंड ज्वैलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (जीजेईपीसी) भी समय-समय पर यह संकेत देती रही है कि वैश्विक मांग में कमजोरी और आर्थिक अनिश्चितता के कारण एक्सपोर्ट दबाव में है। 


ताजा माहौल में, लाखों परिवारों की आजीविका पर संकट दिख रहा है। ज्वेलरी इंडस्ट्री केवल बड़े शोरूम या एक्सपोर्टक कंपनियों तक सीमित नहीं है। यह एक विशाल रोजगार श्रृंखला है, जिससे देश के लगभग 50 लाख से अधिक परिवार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, सूरत, राजकोट, अहमदाबाद, जयपुर और त्रिवेंद्रम जैसे शहर इस इंडस्ट्री के प्रमुख केंद्र हैं। इन शहरों में लाखों कारीगर, डिजाइनर, निर्माता, बुलियन व्यापारी, पैकिंग एजेंसियां, परिवहन सेवाएं और खुदरा विक्रेता कार्यरत हैं। जब ज्वेलरी की मांग घटती है, तो इसका प्रभाव पूरी सप्लाई चेन पर पड़ता है। सबसे अधिक प्रभावित छोटे कारीगर और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक होते हैं, जिनकी आय सीधे उत्पादन और बिक्री पर निर्भर करती है। यदि मंदी लंबी चली तो कई छोटी इकाइयों को बंद होने की नौबत आ सकती है। इससे रोजगार संकट और सामाजिक समस्याएं बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ज्वेलरी इंडस्ट्री में गिरावट केवल व्यापारिक समस्या नहीं है, बल्कि यह लाखों परिवारों की आजीविका से जुड़ा राष्ट्रीय आर्थिक मुद्दा भी है।


अगले दो साल न केवल ज्वेलरी इंडस्ट्री के लिए बल्कि सभी सेक्टर के लिए सबसे कठिन हो सकते हैं। आर्थिक विश्लेषक भी कह रहे हैं कि आने वाले दो वर्षों का समय लगभग सभी उद्योगों के लिए चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। बढ़ती महंगाई, ऊंची ब्याज दरें, वैश्विक अनिश्चितता और कमजोर उपभोक्ता मांग इसके प्रमुख कारण हैं। ज्वेलरी इंडस्ट्री पर इसका प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक पड़ सकता है क्योंकि यह आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में नहीं आता। आज आम परिवारों का बजट पहले से अधिक दबाव में है। खाद्य पदार्थों, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास पर खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में लोग अपनी आय का बड़ा हिस्सा केवल जरूरी जरूरतों पर खर्च कर रहे हैं। गोल्ड, सिल्वर, डायमंड और प्लेटिनम जैसी महंगी ज्वेलरी खरीदने का निर्णय अब केवल विशेष अवसरों तक सीमित होता जा रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि महंगाई और आर्थिक दबाव बना रहा तो उपभोक्ता केवल अत्यंत आवश्यक मौकों पर ही ज्वेलरी खरीदेंगे।


ऐसे बदले हुए माहौल में भी ज्वेलरी बिजनेस करने वालों की सबसे पहली जरूरत है व्यापार के चलते रहना, इसके लिए लाइटवेट ज्वेलरी और जेन-ज़ेड पर बढ़ता फोकस सबसे पहला नजरिया है।  मंदी और आर्थिक दबाव के बीच ज्वेलरी इंडस्ट्री अपनी रणनीति बदल रहा है। अब अधिकांश ज्वेलर्स लाइटवेट ज्वेलरी के निर्माण पर जोर दे रहे हैं। कम वजन वाली ज्वेलरी अपेक्षाकृत सस्ती होती है और इसे खरीदना मध्यम वर्ग तथा युवा ग्राहकों के लिए आसान होता है। इंडस्ट्री की नजर विशेष रूप से जेन-ज़ेड पीढ़ी पर है। यह पीढ़ी पारंपरिक भारी ज्वेलरी की बजाय आधुनिक, फैशनेबल और उपयोगी डिजाइनों को प्राथमिकता देती है। युवा ग्राहक कम कीमत में आकर्षक और ट्रेंडी उत्पाद चाहते हैं। इसी कारण ज्वेलरी कंपनियां हल्के वजन के नेकलेस, रिंग, ब्रेसलेट और डायमंड स्टड्स जैसे उत्पादों की नई श्रृंखलाएं बाजार में ला रही हैं। यदि आने वाले समय में महंगाई और आर्थिक दबाव जारी रहता है, तो लाइटवेट ज्वेलरी इंडस्ट्री की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। 


भारतीय ज्वेलरी इंडस्ट्री वर्तमान समय में अपने सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। घरेलू ग्राहकी में गिरावट, एक्सपोर्ट में कमी, वैश्विक आर्थिक संकट, युद्ध जैसे हालात और बढ़ती महंगाई ने इस क्षेत्र की चिंताएं बढ़ा दी हैं। लाखों परिवारों की आजीविका इस इंडस्ट्री पर निर्भर है, इसलिए इसकी चुनौतियां केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। हालांकि स्थिति कठिन है, लेकिन इंडस्ट्री पूरी तरह निराश नहीं है। लाइटवेट ज्वेलरी, नए डिजाइन, युवा ग्राहकों पर फोकस और नए एक्सपोर्ट मार्केट्स की खोज जैसे प्रयास भविष्य में राहत दे सकते हैं। फिर भी यह स्पष्ट है कि आने वाले दो वर्ष ज्वेलरी इंडस्ट्री के लिए बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक साबित होंगे। जो कंपनियां बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेंगी, वही इस कठिन दौर से सफलतापूर्वक निकल पाएंगी।


महेश बाफना - भवानी गोल्ड प्रा. लि
महेश बाफना - भवानी गोल्ड प्रा. लि

ज्वेलरी इंडस्ट्री में मंदी दिख रही है। इससे बचाव के लिए क्या रणनीति बनाई जाए कि बिक्री को बनाए रखने में मदद मिले और ग्राहकों को भी ज्वेलरी बाजार से जोडक़र रखे, यह बड़ी चिंता का विषय है। माहौल मंदी का है, लेकिन इंडस्ट्री को उम्मीद है कि बदलती उपभोक्ता पसंद के अनुरूप उत्पाद विकसित करके वह मंदी के प्रभाव को कुछ हद तक कम कर किया जा सकता है।







श्रेयांश कोठारी - बी. डी. बैंगल्स
श्रेयांश कोठारी - बी. डी. बैंगल्स

मंदी के इस दौर में, अगले दो वर्ष ज्वेलरी कारोबार के लिए परीक्षा की घड़ी हैं। ज्वेलरी सेक्टर में सेल की स्पीड धीमी रहेगी और इंडस्ट्री को लंबे समय तक कमजोर डिमांड का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे संकट के माहौल में सभी ज्वेलरी निर्माताओं को अपना समय इनोवेशन में लगाना चाहिए, ताकि अभी किए गए नए नए इनोवेशन आने वाले सई सालों का सहारा बन सके।






रिंकु बाफना - लक्ष्मी गोल्ड
रिंकु बाफना - लक्ष्मी गोल्ड

वर्तमान आर्थिक हालात में सुधार नहीं हुआ तो भारतीय ज्वेलरी एक्सपोर्ट में और गिरावट आ सकती है और ज्वेलरी मार्केट्स में नई परेशानी खड़ी होगी। मंदी की वजह से हर सेक्टर में लोगों के पास पैसा ही कम आ रहा है तो कोई ज्वेलरी कैसे खरीदेगा, यह समझते हुए व्यापार को बचाना है। समझ में आ रहा है कि आर्थिक हालात धीरे धीरे सुधरेंगे, ऐसे में ज्वेलरी इंडस्ट्री को धैर्य की जरूरत है।






अनिल पामेचा - स्काय चेन्स
अनिल पामेचा - स्काय चेन्स

हमें यह समझना होगा कि जब आर्थिक परिस्थितियां अनुकूल होती हैं, तब लोग निवेश और शौक दोनों के लिए ज्वेलरी खरीदते हैं, लेकिन जब पूरी दुनिया ही आर्थिक संकट की ओर बढ़ रही है, तो लोग सबसे पहले ऐसे खर्चों में कटौती कर रहे हैं, जो लग्जरी से जुड़े हैं। मंदी का माहौल के गहराने से आज लोगों की प्राथमिकताएं बदल रही हैं, ऐसे में ज्वेलरी बिजनेस पर संकट साफ दिख रहा है।


 
 
 

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