सिल्वर की बढ़ती जरूरत, चढ़ते रेट
- Aabhushan Times
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सिल्वर पर वैश्विक स्तर पर संकट का साया मंडराता दिख रहा है। सिल्वर का खनन लगातार घटता जा रहा है और डिमांड बढ़ती जा रही है, क्योंकि खपत लगातार विकसित हो रही है। इसीलिए, माना जा रहा है कि एक बार फिर सिल्वर की किस्मत चमक सकती है।
दुनिया भर के निवेशकों की नजरें आमतौर पर गोल्ड पर देखी जाती रही हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सिल्वर ने भी वैश्विक वित्तीय बाजारों में अपनी अलग पहचान बनाई है। गोल्ड की तरह सिल्वर भी एक कीमती धातु है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल निवेश का साधन नहीं बल्कि आधुनिक उद्योगों की एक अनिवार्य आवश्यकता भी है। यही कारण है कि विशेषज्ञ आने वाले वर्षों में सिल्वर को गोल्ड की तुलना में अधिक तेज रिटर्न देने वाली धातु मान रहे हैं। वर्तमान समय में दुनिया एक साथ कई चुनौतियों से जूझ रही है। पश्चिम एशिया में तनाव, तेल संकट, वैश्विक आर्थिक मंदी की आशंकाएं, हरित ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार और खनन उत्पादन में कमी जैसे कारक सिल्वर बाजार को प्रभावित कर रहे हैं। इन परिस्थितियों में सिल्वर की मांग लगातार बढ़ रही है, जबकि आपूर्ति उसकी गति से नहीं बढ़ पा रही है। यही स्थिति भविष्य में कीमतों में बड़ी तेजी का आधार बन सकती है। क्योंकि सिल्वर का बाजार बहुत संवेदनशील हो चुका है। टैरिफ घोषणाएं लगातार होने से अमेरिकी नीतियों में तेजी से आ रहे बदलाव और वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के कारण इसकी कीमतों में अचानक तीव्र गिरावट के साथ ही बहुत तेज उछाल भी आ सकता है।
सिल्वर केवल कीमती धातु नहीं, बल्कि आधुनिक उद्योगों की रीढ़ है। गोल्ड की तुलना में सिल्वर का औद्योगिक उपयोग कहीं अधिक व्यापक है। आज सौर ऊर्जा संयंत्रों, इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरियों, सेमीकंडक्टर, मेडिकल उपकरणों, दूरसंचार तकनीक और उच्च गुणवत्ता वाले इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों में सिल्वर का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार वैश्विक सिल्वर खपत का आधे से अधिक हिस्सा औद्योगिक क्षेत्रों से आता है। यही कारण है कि जैसे-जैसे दुनिया हरित ऊर्जा और डिजिटल तकनीक की ओर बढ़ रही है, सिल्वर की आवश्यकता भी लगातार बढ़ती जा रही है। विशेष रूप से सोलर पैनल उद्योग सिल्वर की मांग का बड़ा स्रोत बन चुका है। हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए अमेरिका, चीन, भारत और यूरोपीय देशों द्वारा किए जा रहे निवेश ने सिल्वर की खपत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया है। यह लगातार छठा साल है जब सिल्वर की वैश्विक मांग इसकी आपूर्ति से काफी अधिक रहने का अनुमान है। इसके कारण सिल्वर की कीमतें बाजार में नए रिकॉर्ड बना सकती हैं और इसे एक अमूल्य औद्योगिक संपत्ति के रूप में देखा जा रहा है। सिल्वर बाजार की सबसे बड़ी चुनौती उसकी आपूर्ति है। पिछले कई वर्षों से वैश्विक स्तर पर सिल्वर का उत्पादन मांग के अनुरूप नहीं बढ़ पाया है। कई प्रमुख खनन क्षेत्रों में उत्पादन लागत बढ़ी है, नए खनन प्रोजेक्ट अपेक्षित गति से शुरू नहीं हो रहे हैं और पर्यावरणीय नियमों के कारण नई खदानों के विकास में देरी हो रही है। विशेषज्ञ इसे संरचनात्मक आपूर्ति घाटा यानी स्ट्रक्चरल सप्लाई डेफिसिट कहते हैं। इसका अर्थ है कि बाजार में इसकी मांग आपूर्ति के मुकाबले लगातार अधिक बनी हुई है।
यह स्थिति सामान्य नहीं है। यदि किसी वस्तु की मांग लगातार बढ़े और उत्पादन सीमित रहे, तो अंतत: कीमतों पर दबाव बनता है। यही कारण है कि कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि सिल्वर की कीमतों में दीर्घकालिक तेजी लगभग तय है। आज दुनिया के कई उद्योग सिल्वर पर निर्भर हैं, लेकिन नई खदानों से पर्याप्त आपूर्ति नहीं आ रही। यदि यही स्थिति जारी रहती है तो आने वाले वर्षों में वैश्विक सिल्वर संकट देखने को मिल सकता है। फिर एक खास बात यह भी है कि दुनिया में सिर्फ सिल्वर की खदाने बहुत कम है। दुनिया का लगभग 70 फीसदी सिल्वर स्वतंत्र खदानों से नहीं, बल्कि पर, जिंक और लीड जैसी अन्य धातुओं के खनन के दौरान एक सह-उत्पाद के रूप में निकलता है। इसलिए, सिर्फ सिल्वर की कीमत बढऩे से कंपनियां इसका उत्पादन तुरंत नहीं बढ़ा सकती।
तेल संकट और सिल्वर के संबंध के गहराई से देखे, तो पहली नजर में तेल और सिल्वर का सीधा संबंध दिखाई नहीं देता, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था में दोनों का गहरा जुड़ाव है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों ने तेल बाजार को अस्थिर बना दिया है। यदि तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो दुनिया में महंगाई बढ़ेगी और उत्पादन लागत भी बढ़ेगी। ऐसी स्थिति में निवेशक अपने पोर्टफोलियो में हार्ड एसेट्स यानी वास्तविक परिसंपत्तियों का हिस्सा बढ़ाते हैं। गोल्ड के साथ-साथ सिल्वर भी इसका प्रमुख लाभार्थी बनता है। इसके अलावा, ऊर्जा परिवर्तन की वैश्विक प्रक्रिया में भी सिल्वर की महत्वपूर्ण भूमिका है। सौर ऊर्जा उत्पादन और इलेक्ट्रिक वाहनों के विस्तार के लिए सिल्वर की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। यानी तेल संकट से लडऩे वाली दुनिया भी अप्रत्यक्ष रूप से सिल्वर की मांग को बढ़ा रही है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है और वैश्विक मंदी की आशंका बनती है, तो औद्योगिक उत्पादन घटने से सिल्वर की औद्योगिक मांग कम हो सकती है, जिससे इसकी कीमतों पर दबाव भी बन सकता है। इसके अलावा, युद्ध के समय डॉलर के मजबूत होने और इंपोर्ट ड्यूटी बढऩे से भी भारतीय बाजारों में सिल्वर की कीमतों में अस्थिरता आने के संभावना है।
बाजार के जानकार बताते हैं कि सिल्वर का फिर से महंगा होना तय है। अंतरराष्ट्रीय बाजार के कई विशेषज्ञों का मानना है कि सिल्वर की कीमतों में अभी लंबी दूरी की तेजी बाकी है। विश्लेषकों के अनुसार सिल्वर अभी भी अपने ऐतिहासिक मुद्रास्फीति-समायोजित उच्च स्तर से काफी नीचे कारोबार कर रही है। यदि निवेशकों की रुचि दोबारा मजबूत होती है और औद्योगिक मांग वर्तमान स्तर पर बनी रहती है, तो सिल्वर में उल्लेखनीय उछाल देखा जा सकता है। हालांकि निकट अवधि में वैश्विक आर्थिक मंदी की आशंकाएं कीमतों को प्रभावित कर सकती हैं, क्योंकि औद्योगिक मांग का बड़ा हिस्सा आर्थिक गतिविधियों पर निर्भर करता है। यदि विश्व अर्थव्यवस्था लंबे समय तक धीमी रहती है तो सिल्वर कुछ समय तक सीमित दायरे में रह सकती है। लेकिन लंबी अवधि में तस्वीर सकारात्मक दिखाई देती है। लगातार आपूर्ति घाटा, हरित ऊर्जा क्षेत्र का विस्तार, निवेश मांग में संभावित वृद्धि और सीमित खनन उत्पादन सिल्वर के पक्ष में मजबूत आधार तैयार कर रहे हैं।
पिछले कुछ सालों में ज्वेलरी के मामले में भारतीय बाजार में सिल्वर की बढ़ती लोकप्रियता को अनदेखा नहीं किया जा सकता। भारत पारंपरिक रूप से गोल्ड का बड़ा उपभोक्ता रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सिल्वर की मांग भी तेजी से बढ़ी है। ग्रामीण क्षेत्रों में सिल्वर को बचत और निवेश के सुरक्षित माध्यम के रूप में देखा जाता है। गोल्ड की ऊंची कीमतों के कारण बड़ी संख्या में उपभोक्ता अब सिल्वर की ओर आकर्षित हो रहे हैं। कम लागत पर उपलब्ध होने के कारण यह मध्यम वर्ग और युवा खरीदारों के लिए अधिक सुलभ विकल्प बन गई है। भारत में निवेश के अलावा धार्मिक उपयोग, उपहार, घरेलू सजावटी वस्तुओं और आभूषणों में भी सिल्वर की मांग लगातार बढ़ रही है। खास बात यह है कि सिल्वर ज्वेलरी उद्योग का तेजी से विस्तार हो रहा है। बाजारों में सिल्वर ज्वेलरी के नए नए शो रूम्स खुल रहे हैं। कारण यही है कि भारतीय ज्वेलरी बाजार में सिल्वर ज्वेलरी एक बड़ा ट्रेंड बन चुकी है। फैशन उद्योग, ऑनलाइन बिक्री प्लेटफॉर्म और युवा उपभोक्ताओं की बदलती पसंद ने इस क्षेत्र को नई गति दी है। विशेष रूप से महिलाओं और युवाओं के बीच सिल्वर ज्वेलरी की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। ऑक्सीडाइज्ड ज्वेलरी, डिजाइनर सिल्वर आभूषण, एथनिक कलेक्शन और आधुनिक फैशन एक्सेसरीज की मांग तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में सिल्वर ज्वेलरी उद्योग दो अंकों की वार्षिक वृद्धि दर दर्ज कर सकता है। गोल्ड की तुलना में कम कीमत और आधुनिक डिजाइनों की उपलब्धता इसे और आकर्षक बना रही है।
ऐसे हालात में जब सिल्वर के महंगा होने के फिर आसानर नजर आ रहे हैं, तो निवेशकों के लिए संकेत साफ है कि वे खरीदें। सिल्वर की सबसे बड़ी ताकत इसकी दोहरी पहचान है। यह एक निवेश धातु भी है और औद्योगिक धातु भी। यही विशेषता इसे गोल्ड से अलग बनाती है। जब वैश्विक अर्थव्यवस्था मजबूत होती है तो औद्योगिक मांग बढ़ती है और सिल्वर को समर्थन मिलता है। वहीं जब आर्थिक अनिश्चितता बढ़ती है तो निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में सिल्वर खरीदते हैं। वर्तमान समय में दोनों प्रकार के कारक धीरे-धीरे सिल्वर के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं। दुनिया हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, खनन उत्पादन सीमित है, निवेशकों की रुचि बढ़ रही है और भारतीय बाजार में आभूषणों की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है।
सिल्वर आज केवल एक कीमती धातु नहीं बल्कि वैश्विक औद्योगिक विकास, ऊर्जा परिवर्तन और निवेश सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है। लगातार बढ़ती मांग और सीमित आपूर्ति के कारण बाजार में संरचनात्मक दबाव बना हुआ है। यदि आने वाले वर्षों में निवेशकों की भागीदारी और बढ़ती है तो सिल्वर की कीमतों में उल्लेखनीय उछाल देखने को मिल सकता है। भारतीय बाजार में भी सिल्वर ज्वेलरी की लोकप्रियता, निवेश मांग और औद्योगिक उपयोग इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक दृष्टि से सिल्वर आने वाले दशक की सबसे महत्वपूर्ण धातुओं में से एक साबित हो सकती है।

गोल्ड महंगा होने के कारण साम्न्य व्यक्ति की पहुंच से बाहर होता रहा है। ऐसे में सिल्वर ज्वेलरी का व्यापार तेजी से बढ़ रहा है। युवा वर्ग तथा महिलाओं में सिल्वर ज्वेलरी का ट्रेंड बढ़ा है। आने वाले दिनों में लोग और इस तरफ बढ़ेंगे, तो सिल्वर ज्वेलरी बिजनेस भी बढ़ेगा।


सिल्वर की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। हालांकि 4 लाख रुपए प्रति किलोग्राम के आसपास जाकर फिर से ढाई लाख के ऊपर है। लेकिन वैश्विक कारणों पर निहाह डालें, तो लंबी अवधि में सिल्वर के एक बार फिर से 4 लाख के पार जाने के आसार साफ नजर आ रहे है।


सिल्वर पर चीन की नई स्ट्रेटेजी भारत समेत कई देशों के लिए एक बड़ी चुनौती बनने वाली है। चीन दुनिया भर में सप्लाई पर पकड़ मजबूत कर रहा है। और भारत की कुल खपत का 40 फीसदी सिल्वर चीन से इंपोर्ट करता है, ऐसे में चीन के शिकंजे से सिल्वर महंगा होने तय है।


सिल्वर का इस्तेमाल अब सिर्फ ज्वेलरी तक ही सीमित नहीं रहा। यह आधुनिक तकनीक का एक अहम हिस्सा बन गई है। ज्वेलरी तो सिल्वर की खपत का केवल एक हिस्सा है, बाकी सौर ऊर्जा पैनलों में सिल्वर का उपयोग बहुत बढ़ गया है। जिससे सिल्वर में यह तेजी तय है।










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