सिल्वर में स्थिरता सप्लाई के संकट और औद्योगिक मांग पर टिका है रेट का रुझान

आज भले ही सिल्वर केवल 2.50 और 2.60 लाख के बीच में ट्रेंड कर रहा है, लेकिन आने वाले कुछ ही महीनो में सिल्वर मं तेजी तय है। अगले साल यह 3 लाख का आंकड़ा भी पार सकता है, लेकिन यह वह स्थिति होगी जब गोल्ड-सिल्वर रेशियो अपनी ऐतिहासिक श्रेणियों को तोडक़र सिल्वर के पक्ष में होगा। सिल्वर अब केवल एक पारंपरिक कीमती मेटल नहीं रहा, बल्कि यह एक प्रमुख औद्योगिक कच्चा माल और रणनीतिक निवेश परिसंपत्ति के रूप में स्थापित हो चुका है। भारतीय बुलियन बिजनेस में ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय कमोडिटी बाजारों में भी इसकी डिमांड तो है, लेकिन कभी कम और कभी ज्यादा होने से इसके रेट में उतार चढ़ाव दिखता रहता है। वैश्विक स्तर पर पॉवर ट्रांसमिशन, ग्रीन एनर्जी के विस्तार और विभिन्न देशों के बीच भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच सिल्वर की दरों में होते ऐतिहासिक बदलावों ने ज्वेलरी उद्योग, बुलियन ट्रेडर्स और औद्योगिक उपयोगकर्ताओं के समक्ष नई संभावनाएं और चुनौतियां पेश की हैं। वित्तीय वर्ष 2026-27 की वर्तमान समयावधि में अंतर्राष्ट्रीय वायदा एवं हाजिर बाजार में सिल्वर 64 से 66 अमेरिकी डॉलर प्रति औंस के उच्च स्तर पर कारोबार कर रही है, जिसके प्रभावस्वरूप भारतीय घरेलू बाजार में सिल्वर की दरें 2.50 से लेकर 2.60 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के दायरे में बनी हुई हैं।
गोल्ड की तुलना में सिल्वर के बाजार की प्रकृति हमेशा से अधिक अस्थिर और बहुआयामी रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जहां गोल्ड की मांग का मुख्य हिस्सा ज्वेलरी और केंद्रीय बैंकों के निवेश तक सीमित रहता है, वहीं वैश्विक सिल्वर की कुल वार्षिक मांग का 55 प्रतिशत से अधिक हिस्सा औद्योगिक सेक्टर से आता है। यही कारण है कि मौजूदा दौर में सिल्वर की कीमतों में आ रही तेजी केवल सट्टेबाजी या ज्वेलरी बाजार की मांग का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे वैश्विक औद्योगिक अर्थव्यवस्था और सप्लाई सिस्टम के बुनियादी बदलाव जिम्मेदार हैं। सिल्वर के तकनीकी और इकोनॉमिक विश्लेषण स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं कि सिल्वर का दीर्घकालिक रुझान मजबूती और तेजी का ही बना रहेगा। औद्योगिक मांग की निरंतर जरूरत और आपूर्ति की सीमितता के कारण इसमें किसी बड़ी या स्थायी मंदी की संभावना बेहद कम है। अल्पकालिक अवधि, यानी चालू वर्ष की अंतिम तिमाही तथा आगामी त्यौहारी एवं विवाह सीजन के दौरान, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सिल्वर के भाव 58 डॉलर से 65 डॉलर प्रति औंस के बीच बने रहने का अनुमान है। इसके प्रभाव से भारतीय बाजार में सिल्वर की दरें 2.60 लाख रुपये से 2.75 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर को छू सकती हैं। इस अवधि में घरेलू मांग और निवेश मांग दोनों में तेजी देखने को मिलेगी, और सिल्वर को नीचे के स्तर पर 1.50 लाख रुपये का वर्तमान मजबूत सपोर्ट बना रहेगा। मध्यमकालिक अवधि, यानी वर्ष 2027 के मध्य तक, यदि वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों में कटौती का सिलसिला जारी रहता है और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर रहता है, तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सिल्वर 68 डॉलर से 75 डॉलर प्रति औंस के स्तर तक पहुंच सकती है। इस स्थिति में भारतीय बाजार में सिल्वर के भाव 2.85 से लेकर 2.95 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के अभूतपूर्व ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर सकते हैं। इसमें सोलर और ईवी उद्योग से आने वाली औद्योगिक मांग कीमतों को नया आधार प्रदान करेगी। दीर्घकालिक परिदृश्य, यानी वर्ष 2027 के अंत तक, यदि वैश्विक ऊर्जा संक्रमण अपनी पूर्ण गति से आगे बढ़ता है और खनन आपूर्ति में कोई बड़ा नया भंडार नहीं जुड़ता है, तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सिल्वर 85 डॉलर से 100 डॉलर प्रति औंस के मनोवैज्ञानिक स्तर की ओर बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में भारतीय घरेलू बुलियन बाजार में सिल्वर की दरें 3 लाख रुपये से 3.20 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर तक पहुंच सकती हैं।
सिल्वर ज्वैलरी बिजनेस से जुड़े हमारे सभी ज्वैलर्स साथियों को यह समझने की जरूरत है कि सिल्वर की कीमतों को 2.5 लाख से ऊंचाई पर पहुंचाने वाला सबसे बड़ा कारण, ज्वेलरी की सेल नहीं बल्कि ग्रीन एनर्जी क्रांति और ग्रीन औद्योगिकरण का तीव्र विस्तार है। सोलर फोटोवोल्टिक सेल के निर्माण में सिल्वर एक अपरिहार्य घटक है, क्योंकि सभी मेटलों में इसकी विद्युत और तापीय चालकता सबसे अधिक होती है। दुनिया भर में सोलर फार्म्स के विस्तार और अगली पीढ़ी के एन-टाइप सोलर सेल्स के आगमन ने प्रति पैनल सिल्वर की खपत को 30 से 50 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्माण में पारंपरिक कारों की तुलना में लगभग दोगुनी सिल्वर का उपयोग होता है, जहां यह बैटरी प्रबंधन प्रणालियों, रिले और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स में व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाती है। फाइव-जी दूरसंचार नेटवर्क के वैश्विक विस्तार, डेटा सेंटरों की स्थापना और एआई आधारित इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्शन ने सिल्वर की औद्योगिक मांग को एक नए स्ट्रक्चरल बुल रन की तेजी में धकेल दिया है।
भारतीय ज्वेलरी बिजनेस और सिल्वर की हैंडीक्राफ्ट् इंडस्ट्री पर इस मूल्य वृद्धि का प्रभाव बेहद व्यापक और दूरगामी रहा है। भारत पारंपरिक रूप से दुनिया में सिल्वर का सबसे बड़ा उपभोक्ता रहा है, लेकिन 1.65 लाख रुपये प्रति किलोग्राम से अधिक के रेट ने रिटेल बाजार के ढांचे को बदल दिया है। व्यापारिक दृष्टिकोण से, रिटेल काउंटरों पर बिकने वाली सिल्वर की कुल मात्रा में 20 से 25 प्रतिशत तक की गिरावट या सुस्ती देखी जा रही है, लेकिन बिजनेस की कुल मुद्रा मूल्य में 35 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। कम वजन बिकने के बावजूद ज्वैलर्स और होलसेलर्स का कुल टर्नओवर बढ़ रहा है, हालांकि इसके साथ ही स्टॉक बनाए रखने की लागत भी दोगुनी हो चुकी है। इसके साथ ही वर्किंग कैपिटल और सप्लाई प्रबंधन के स्तर पर सिल्वर कारोबारियों को भारी दबाव का सामना करना पड़ रहा है। एक मध्यम स्तर के सिल्वर के थोक व्यापारी या निर्माता को पहले जिस स्टॉक को बनाए रखने के लिए 50 लाख रुपये की आवश्यकता होती थी, उसी वजन के स्टॉक के लिए अब 1 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी ब्लॉक करनी पड़ रही है। बैंकों और बुलियन एजेंसियों द्वारा दिए जाने वाले क्रेडिट में कमी आई है, जिससे निर्माताओं ने कारीगरों और रिटेलर्स को दी जाने वाली उधारी अवधि को घटा दिया है। इसके परिणामस्वरूप, पूरे सप्लाई चेन में कैश या शॉर्ट टर्म पेमेंट साइकल को प्राथमिकता दी जा रही है। सिल्वर के मामले में, उपभोक्ता व्यवहार में आए बदलावों की बात करें तो महंगे होते गोल्ड ने सिल्वर के ज्वेलरी और उपहार वस्तुओं के लिए एक नया और बड़ा बाजार तैयार कर दिया है। जब गोल्ड 1.50 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के पार पहुंच चुका है, तब मध्यम वर्ग और युवा उपभोक्ता दैनिक उपयोग और फैशन ज्वेलरी के लिए सिल्वर की ओर रुख कर रहे हैं। विशेष रूप से 92.5 स्टर्लिंग सिल्वर ज्वैलरी की मांग में जबरदस्त उछाल आया है।
पारंपरिक रूप से भारत में सिल्वर को केवल 999 फाइन बार, पायबल, बिछिया या पूजा के बर्तनों तक सीमित माना जाता था, लेकिन अब रोडियम प्लेटिंग, सिंथेटिक जेमस्टोन्स और एंटीक फिनिश वाली स्टर्लिंग सिल्वर ज्वैलरी एक स्वतंत्र लाइफस्टाइल ब्रांड सेगमेंट बन चुकी है। पारंपरिक पायल, कड़े और सिल्वर के बर्तनों के निर्माण क्षेत्रों, जैसे आगरा, मथुरा, कोल्हापुर, सेलम, राजकोट और जयपुर के प्रोडक्शन हब में बड़ा तकनीकी और संरचनात्मक बदलाव आ रहा है। इन केंद्रों पर भारी ठोस बर्तनों और पायलों के स्थान पर अब इलेक्ट्रोफॉर्मिंग टेक्नोलॉजी, थ्रीडी कास्टिंग और हॉलोवेयर तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। इन आधुनिक तकनीकों की मदद से निर्माता दिखने में भारी और आकर्षक सिल्वर के उत्पाद बेहद कम वजन में तैयार कर रहे हैं, जिससे अंतिम ग्राहक के लिए बजट सीमा में खरीदारी करना संभव हो पा रहा है।
दूसरी तरफ, वैश्विक स्तर पर सिल्वर की सप्लाई चेन एक बड़ी कमी का सामना कर रही है। सिल्वर का अधिकांश उत्पादन प्राथमिक सिल्वर की खदानों से नहीं होता, बल्कि यह तांबा, जस्ता, और सीसा की खदानों से बाय प्रोडक्ट के रूप में निकाली जाती है। इस वजह से जब तांबे या जस्ते का वैश्विक खनन प्रभावित होता है, तो सिल्वर की आपूर्ति खुद-ब-खुद बाधित हो जाती है। पिछले पांच वर्षों से वैश्विक स्तर पर सिल्वर की कुल वार्षिक मांग इसकी कुल खदान आपूर्ति और रीसाइक्लिंग की तुलना में लगातार कहीं अधिक रही है। लंदन बुलियन मार्केट एसोसिएशन और कोमेक्स के रजिस्टर्ड वेयरहाउसों में सिल्वर का उपलब्ध भंडार लगातार घट रहा है, जिसने बाजार में डिलीवरी प्रीमियम को बढ़ा दिया है।
भारत अपनी सिल्वर की कुल आवश्यकता का लगभग 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में उछाल के साथ-साथ अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की विनिमय दर में होने वाला उतार-चढ़ाव घरेलू बाजार में आयातित सिल्वर की लैंडिंग कॉस्ट सीधे तौर पर बढ़ जाती है। इसलिए भी सिल्वर भले ही अपने सबसे ऊपर के दौर, सवा 4 सलाख रुपए से काफी नीचे हैं, लेकिन आज भी 2.5 लाख के नीचे जाने की संभावना बिल्कुल भी नहीं है। ज्वेलरी मार्केट के ज्यादातर बिजनेसमैन इस बात के गवाह है कि सिल्वर के बुलियन बाजार में रीसाइक्लिंग यानी पुराने सिल्वर के स्क्रैप का योगदान भी तेजी से बढ़ा है। ऐतिहासिक रूप से ग्रामीण भारत में सिल्वर को संकट के समय की संपत्ति माना जाता रहा है। बरसों पहले बेहद सस्ते दामों में खरीदीदी गई सिल्वर ज्वेलरी और सिल्वर को वर्तमान में उच्च दरों का लाभ उठाने के लिए ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों से भारी मात्रा में बाजार में रीसायकल होने के लिए ला रहे हैं। नए ज्वेलरी और बर्तनों की कुल बिक्री में स्क्रैप सिल्वर का योगदान अब 35 से 45 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जिससे आयात पर निर्भरता में आंशिक रूप से कमी आई है और घरेलू बुलियन बाजार में लिक्विडिटी को सहारा मिला है।

सिल्वर ज्वेलरी का बाजार बढ़ रहा है, लोग नई तरह की लाइट वेट सिल्वर ज्वैलरी को पसंद करने लगे हैं। इस नई दिशा ने रिटेलर्स को बड़ी राहत दी है क्योंकि इससे उनकी व्यापारिक गतिविधियों को बल मिला है। सिल्वर ज्वैलरी के निर्माताओं को आधुनिक इलेक्ट्रोफॉर्मिंग और सीएनसी तकनीक में निवेश करना चाहिए ताकि कम वजन में मजबूत और आकर्षक ज्वेलरी तैयार किए जा सकें।

महंगो होते गोल्ड के कारण सिल्वर के रेट्स ग्राहक को अनुकूल लग रहे हैं और अब सिल्वर की शुद्धता को लेकर ग्राहक पहले से अधिक जागरूक हैं और हॉलमार्क सिल्वर ज्वेलरी के लिए प्रीमियम देने को भी तैयार हैं। इससे ग्रामीण इलाकों के उन कारोबारियों को भी सिस्टम में आना पड़ रहा जो ज्वैलरी की शुद्धता या वजन में समझौते करने वाला बिजनेस करते थे।

सिल्वर में ग्राहकी है, लेकिन बुलियन में चल रही स्थिरता और ज्वैलरी की सेल में तेजी केवल एक अल्पकालिक उछाल नहीं, बल्कि यह नई पीढ़ी की बदलती पसंद और आर्थिक क्षमता के संतुलन का एक स्थायी परिणाम है। इसी कारण सिल्वर का कारोबार धीरे-धीरे संगठित रिटेल चेन्स और ब्रांडेड स्टोर्स की तरफ शिफ्ट हो रहा है।

सिल्वर आने वाले समय में 2.75 से 3 लाख रुपये किलोग्राम तक जाने की संभावना रही है, लेकिन थोड़ा इंतजार भी करना पड़ सकता है। ज्वेलरी और बुलियन बाजार के लिए सिल्वर के रेट में बहुत तेजी से होने वाला उतार चढ़ाव ही इसकी सेल में अवरोध का सबसे बड़ा कारण है, लेकिन गोल्ड के मुकाबले सस्ता होने के कारण सिल्वर की सेल जारी रहेगी।










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