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गोल्ड पर भरोसा, मगर उत्साह कमऐतिहासिक तेजी, फिर अचानक गिरावट और अब 2 लाख का इंतजार

  • Aabhushan Times
  • 1 day ago
  • 7 min read

आने वाले वक्त में, गोल्ड अब धीरे - धीरे बढऩे वाला नहीं, बल्कि यह बढ़ोतरी और घटोतरी दोनों ही बहुत तेज होने वाली है। ऐसे तेज तेजी – मंदी के हालात में गोल्ड 2 लाख का आंकड़ा इस साल के अंत तक छू सकता है।










 राकेश लोढ़ा

पिछले महीने जनवरी - 2026 के मध्य में भारतीय सर्राफा बाजार ने वह दृश्य देखा, जो अब तक केवल सैद्धांतिक चर्चाओं तक सीमित था गोल्ड ने 1,85,000 प्रति 10 ग्राम से भी ऊपर का ऐतिहासिक उच्चतम स्तर छू लिया। यह आंकड़ा केवल कीमत नहीं था, बल्कि वैश्विक अनिश्चितताओं, दुनिया भर के देशों की घबराहट और रुपये की कमजोरी के साथ साथ वैश्विक स्तर पर डॉलर की भी कमजोरी का संयुक्त परिणाम था। इस स्तर पर पहुंचते ही बाजार में दबाव स्पष्ट दिखा। आम खरीदार पीछे हटने लगे और ज्वेलरी की मांग अचानक ठहर गई। इसके तुरंत बाद गोल्ड के दाम फिर से 1,48,000 से बी नीचे उतर कर फिर से 1,60,000 के आसपास ट्रेंड करने लगे। इस गिरावट ने एक संकेत दिया कि भारतीय बाजार अभी भी गोल्ड की अत्यधिक ऊंची कीमतों को लंबे समय तक आत्मसात करने की स्थिति में नहीं है। ऊंचे रेट्स पर मुनाफा वसूली तेज हुई, खासकर उन निवेशकों द्वारा जिन्होंने गोल्ड को शॉर्टटर्म सेफ हेवन की तरह इस्तेमाल किया था। इस बहुत तेज उतार - चढ़ाव ने बाजार की संवेदनशीलता उजागर की। गोल्ड के वैश्विक परिदृश्य में देखा जाए, तो एक ओर गोल्ड में दुनिया का ऐतिहासिक विश्वास कायम है, दूसरी ओर इतनी तेज कीमतें ज्वेलरी के उपभोक्ता को खरीदी से रोक देती हैं। भारत, जहां गोल्ड केवल निवेश नहीं बल्कि सामाजिक सुरक्षा भी है, वहां खरीदारी स्थगित होने लगी। बाजारों में भी ज्वेलरी की जगह डिजिटल गोल्ड और गोल्ड की ओर झुकाव दिखा। कुल मिलाकर, 1.85 लाख का शिखर एक चेतावनी की तरह सामने आया कि भारतीय बाजार में गोल्ड का विश्वास मजबूत है, लेकिन कीमतें यदि उपभोग की सीमा से बाहर चली जाती हैं, तो अस्थायी ठहराव तय है। लेकिन, गोल्ड अब आने वाले वक्त में, धीरे - धीरे बढऩे वाला नहीं, बल्कि यह बढ़ोतरी और घटोतरी दोनों ही घटनाओं पर आधारित रहने वाली है। फिर भी माना जा रहा है कि इस साल के एंड तक गोल्ड 1,90,000 का आंकड़ा पार कर सकता है। गोल्ड के इंटरनेशनल मार्केट में तेजी, और उसके बाद तेज गिरावट सहित सन 2026 के कुल संभावित रुझान पर गैर करें, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में गोल्ड की कीमतों में आई तेज उछाल के पीछे कई वास्तविक कारण रहे। सबसे बड़ा कारण वैश्विक आर्थिक अस्थिरता रही। यूरोप में मंदी की आशंका, चीन की धीमी ग्रोथ, और मध्यपूर्व व एशिया में राजनीतिक अत्थिरता की आशंकाएं। इसके साथ ही डॉलर इंडेक्स में उतार - चढ़ाव और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में अनिश्चितता ने निवेशकों को गोल्ड की ओर मोड़ा। लेकिन जैसे ही बाजार को यह संकेत मिला कि अमेरिकी ब्याज दरों में आक्रामक बढ़ोतरी का दौर सीमित हो सकता है, और वैश्विक सेंट्रल बैंक अपने रुख को थोड़ा संतुलित कर रहे हैं, गोल्ड में मुनाफा वसूली शुरू हो गई। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें ऊपरी स्तर से नीचे आईं। हालांकि गोल्ड के रेट्स के स्थिर होने का सवाल पूरी तरह मौद्रिक नीति पर निर्भर है। जब तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्पष्ट स्थिरता नहीं आती और ब्याज दरों का भविष्य साफ नहीं होता, तब तक गोल्ड पूरी तरह शांत नहीं होगा। जहां तक 2026 के अंत तक भारत में गोल्ड की कीमत का सवाल है, मौजूदा ट्रेंड के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यदि वैश्विक अस्थिरता बनी रहती है, तो गोल्ड 1.90 लाख से 2.10 लाख प्रति 10 ग्राम तक पहुंच सकता है। हालांकि यह बढ़ोतरी सीधी नहीं होगी, बीच - बीच में तेज गिरावट और ठहराव भी देखने को मिलेंगे। अर्थात, गोल्ड अब धीरे - धीरे बढऩे वाला नहीं, बल्कि घटना आधारित एसेट बन चुका है।

गोल्ड पर सबसे गहरा असर हाल के वर्षों में अमेरिकी नीतियों से पड़ा है। विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक रणनीतियों ने वैश्विक बाजार में अनिश्चितता को जन्म दिया। संरक्षणवादी व्यापार नीति, टैरिफ युद्ध और डॉलर केंद्रित सोच ने निवेशकों को वैकल्पिक सुरक्षित संपत्ति की तलाश में धकेला। इसके साथ ही अमेरिकी सेंट्रल बैंक, यानी फेडरल रिजर्व के चेयरमेन की नियुक्ति और उनकी नीतिदृष्टि पर भी बाजार की पैनी नजर रहती है। यदि फेडरल रिजर्व सख्त रुख अपनाता है, तो गोल्ड दबाव में आता है, और जैसे ही नरमी के संकेत मिलते हैं, गोल्ड चमकने लगता है। दूसरा बड़ा कारण है सेंट्रल बैंकों की रिकॉर्ड खरीदारी। रूस, चीन, तुर्की और भारत जैसे देशों ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में गोल्ड की हिस्सेदारी बढ़ाई है। यह ट्रेंड गोल्ड को दीर्घकालिक मजबूती देता है। इसके साथ साथ गोल्ड की उपलब्धता सीमित है। खनन लागत बढ़ रहा है, नए बड़े भंडार कम मिल रहे हैं, और पर्यावरणीय नियमों के कारण उत्पादन की गति धीमी है। मांग बढऩे और आपूर्ति सीमित रहने का यह असंतुलन कीमतों को ऊपर बनाए रख सकता है। इस तरह, अमेरिकी नीति, वैश्विक खरीदारी और सीमित उपलब्धता, इन तीनों से मिलकर गोल्ड अस्थिर लेकिन मजबूत स्थिति बनाए हुए हैं।

तेजी से बदलते गोल्ड रेट्स का सबसे सीधा असर ज्वेलरी मार्केट पर पड़ा है। ज्वेलरी मार्केट में अस्थिरता से व्यापारियों की चिंता वाजिब है। कीमतों में रोज़ाना हजारों रुपये का उतार - चढ़ाव ग्राहकों को भ्रमित कर रहा है। विवाह का सीजन होने के बावजूद अपेक्षित खरीदी न होना ज्वेलर्स के लिए चिंता का विषय बन गया है। ग्राहक अब आज खरीदें या रुकें की दुविधा में फंसे हैं। ऊंचे रेट्स पर खरीदी करने के बाद यदि दाम गिर जाएं, तो पछतावे का डर बना रहता है। यही कारण है कि लोग या तो ज्वेलरी की खरीदारी टाल रहे हैं, या केवल जरूरत भर की हल्की ज्वेलरी ले रहे हैं और या फिर पुरानी ज्वेलरी को रिसाइकल करवा रहे हैं। ज्वेलर्स के लिए स्टॉक मैनेजमेंट भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। ऊंचे रेट पर खरीदा गया स्टॉक यदि बाजार गिरते ही सस्ता दिखने लगे, तो मार्जिन पर सीधा असर पड़ता है। छोटे और मझोले ज्वेलर्स के लिए यह स्थिति और भी कठिन है। बाजार के जानकारों का मानना है कि रेट्स में स्थिरता ही खरीदी को वापस ला सकती है। जब गोल्ड कुछ समय तक एक सीमित दायरे में रहता है, तभी ग्राहक मानसिक रूप से आश्वस्त होते हैं। फिलहाल ज्वेलरी बाजार प्रतीक्षा की स्थिति में है, और रेट्स में स्थिरता आने का इंतजार किया जा रहा है। गोल्ड के उभरते दामों की लहर ने भारत के ज्वेलरी निर्यात और घरेलू खरीदी दोनों पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। भारत पारंपरिक रूप से दुनिया का एक प्रमुख गोल्ड ज्वेलरी निर्माता और निर्यातक रहा है, लेकिन हाल के कीमतों के ऊंचे स्तर पर पहुंचने के कारण बाजार कठिन दौर से गुजऱ रहा है। उच्चतम वैश्विक और घरेलू गोल्ड भाव ने ज्वेलरी निर्यात को ठहराव की स्थिति में ला दिया है, क्योंकि बुलियन की लागत और सरकारी नीतिगत बाधाएं, जैसे कस्टम ड्यूटी और ट्रेड टैरिफ आदि ने मिलकर निर्यातकों के मार्जिन को दबा रहे हैं। वल्र्ड गोल्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के अंत में भारत के गोल्ड- और जेम्स एवं ज्वेलरी निर्यात में गिरावट देखी गई, जिसमें अक्टूबर 2025 के महीने में कुल निर्यात लगभग 30.57 प्रतिशत गिरकर लगभग 2.17 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक रह गया, जो कि गोल्ड ज्वेलरी की वैश्विक मांग में कमजोरी और बुलियन की कीमतों उतार-चढ़ाव की वजह से था। 

भारतीय गोल्ड ज्वेलरी की डिमांड में यह वैश्विक गिरावट इस बात का संकेत है कि महंगी गोल्ड ज्वेलरी फिलहाल अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए भी बढे हुए रेट्स के बीच किफायती नहीं रह गई है, खासकर जब यूरोप और अमेरिका जैसे बड़े बाज़ारों में लग्जरी ज्वेलरी की खपत में गिरावट भी देखी जा रही है। बाजार में अस्थिरता ने, न केवल निर्यातकों को चिंतित किया है, बल्कि घरेलू खरीदी पर भी एक स्पष्ट मंदी का प्रभाव डाला है। वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार भारत में 2025 में गोल्ड की कुल मांग में लगभग 11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जिसका मुख्य कारण ऊंचे दामों के कारण ज्वेलरी खरीद में ठहराव तथा निवेश रवैये की प्राथमिकता में बदलाव है। घरेलू खरीदी में गिरावट का सबसे बड़ा संकेत यह है कि उपभोक्ता अब पारंपरिक भारी भरकम भारतीय गोल्ड ज्वेलरी के बजाय हल्की ज्वेलरी या गोल्ड बार, कॉइन्स जैसे निवेश की ओर रुख कर रहे हैं। निवेश स्वरूप गोल्ड बार और कॉइन्स में लागत और टैक्स का भार अपेक्षाकृत कम है। इस बदलाव ने ज्वेलरी शोरूम्स में स्टॉक को चुनौती दी है और खरीदारों को 'तेल देखो, तोल की धार देखोÓ की मानसिकता में खड़ा कर दिया है, जिससे गोल्ड की डिमांड में गिरावट और अधिक तीव्र हुई है। कुल मिलाकर, महंगे गोल्ड के दौर में भारत के गोल्ड ज्वेलरी एक्सपोर्ट में स्थिरता और घरेलू खरीदी में गिरावट एक सटीक संकेत है कि दुनिया भर के गोल्ड बाजार अब केवल गोल्ड के रेट्स में स्थिरता की प्रतीक्षा कर रहा है।

भारत में गोल्ड केवल धातु नहीं, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक आधार है। यह बचत का पारंपरिक माध्यम, संकट का सहारा और सामाजिक सुरक्षा का प्रतीक रहा है। आगे चलकर गोल्ड और महंगा हो सकता है, जो कि होना ही है। खासकर यदि वैश्विक अस्थिरता और रुपये पर दबाव बना रहता है, तो गोल्ड फिर से तेजी पकड़ते देर नहीं करेगा। लेकिन इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में गोल्ड की भूमिका सबसे मजबूत बनी रहेगी। यह मुद्रास्फीति से सुरक्षा देता है, विदेशी मुद्रा भंडार को संतुलन देता है और घरेलू बचत को स्थायित्व प्रदान करता है। हालांकि अत्यधिक महंगाई बाजार की स्थिरता के लिए चुनौती है। सरकार और नियामकों के लिए यह जरूरी होगा कि गोल्ड आधारित निवेश को औपचारिक चैनलों की ओर मोड़ा जाए, ताकि आयात दबाव और चालू खाते का घाटा नियंत्रित रहे। वैसे, गोल्ड आज एक साथ विश्वास और अस्थिरता का प्रतीक बन चुका है। वैश्विक राजनीति, आर्थिक नीतियां और सीमित आपूर्ति इसे ऊंचा रखती हैं, जबकि भारतीय उपभोक्ता की क्रयशक्ति इसकी गति को सीमित करती है। आने वाले वर्षों की बात तो बहुत दूर हैं, लेकिम इस वर्ष के अंत तक ही गोल्ड में 50 हजार तक की तेजी आ सकती है तथा गोल्ड लगभग 1,90,000 से लेकर 2 लाख रुपए तक ऊपर की ओर जा सकता है, लेकिन उसकी असली परीक्षा स्थिरता में है। जब तक कीमतें संतुलित नहीं होंगी, तब तक बाजार में गोल्ड पर भरोसा तो बना रहेगा, पर उत्साह नहीं।


प्रमोद मेहता - शाइन शिल्पी

गोल्ड बिजनेस इस समय अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। रिकॉर्ड ऊंचे रेट्स ने कारोबार की रफ्तार थाम दी है। खरीदार इंतज़ार की मुद्रा में हैं, जबकि ज्वेलर्स स्टॉक और कैश फ्लो को लेकर सतर्क हो गए हैं। बाजार में भरोसा है, पर स्थिरता फिलहाल नदारद है। 





महावीर जैन - शंकेश ज्वेलर्स लि.

वैश्विक आर्थिक दबाव और निवेश की मांग बनी रही तो गोल्ड के रेट और ऊपर जा सकते हैं। हालांकि यह बढ़त सीधी नहीं होगी। बीच-बीच में तेज गिरावट संभव है। मेरा मानना हैं कि जब तक रेट एक सीमित दायरे में स्थिर नहीं होंगे, तब तक वास्तविक खरीदी लौटना मुश्किल है।





अश्विन शाह - अंसा ज्वेलर्स प्रा. लि.

गोल्ड के रेट्स में रोज़ाना बड़े उतार-चढ़ाव ने ज्वेलर्स की चिंता बढ़ा दी है। ऊंचे रेट पर खरीदा गया माल अगर अचानक सस्ता दिखने लगे, तो मार्जिन पर सीधा असर पड़ता है। छोटे ज्वेलर्स के लिए यह स्थिति ज्यादा जोखिम भरी बनती जा रही है।






चिंतन सोलंकी - संगम हाऊस ऑफ ज्वेल्स

ज्वेलर्स को सबसे ज्यादा उम्मीद गोल्ड के रेट्स की स्थिरता से है। हमारा मानना है कि जैसे ही रेट कुछ समय तक संतुलित रहेंगे, ग्राहक दोबारा बाजार में लौटेंगे। फिलहाल पूरा ज्वेलरी सेक्टर सतर्कता और प्रतीक्षा के दौर में है, जहां जल्दबाज़ी नहीं, हालात देखने की टाइम है।


 
 
 

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