संपादकीय... गोल्ड की स्थिरता से असमंजस, मगर बाजार में उम्मीद बरकरार
- Aabhushan Times
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पिछले कुछ समय से बाजार के हालात देखें, तो भारत में गोल्ड की कीमतों को लेकर इस समय एक अजीब सा असमंजस बना हुआ है। पिछले कुछ महीनों का रुझान देखें तो गोल्ड ने लगातार नई ऊंचाइयों को छुआ, लेकिन उसी तेजी के बीच अचानक आने वाली गिरावट ने बाजार की दिशा को धुंधला कर दिया है। निवेशक और ज्वेलरी व्यापारी दोनों ही यह तय नहीं कर पा रहे कि यह अस्थायी उतार - चढ़ाव है या किसी बड़े बदलाव का संकेत। 'आभूषण टाइम्स' ज्वेलरी जगत की प्रमुख पत्रिका होने के नाते बाजार के हर कदम पर हमारी सदा से नजर रहती है। इसीलिए हम देखते रहे हैं कि गोल्ड जनवरी महीने में 1.30 लाख पर था, लेकिन बाद में 1.84 लाख के आस-पास पहुंच गया। लेकिन अब फिर से 151 पर ट्रेंड कर रहा है। तो ऐसे हालात में हम कह सकते हैं कि पिछले तीन से चार महीनों में गोल्ट के रेट्स ने जो रिकॉर्ड स्तर बनाया, जिसे फिर से वह पाने को बेताब है।
हमारे प्रतिनिधि जब बाजार में जाते हैं, व्यापारियों से मिलते हैं और ट्रेड विश्लेषकों से बातचीत करते हैं, तो गोल्ड के तेजी पकडऩे का जो कारण साफ नजर आते हैं, वे यही हैं कि वैश्विक अनिश्चितताओं, जैसे दो देशों के आपसी तनाव, डॉलर की चाल और केंद्रीय बैंकों की खरीद ने गोल्ड को सुरक्षित निवेश के रूप में फिर से मजबूत किया। हालांकि इसी दौरान कुछ चरणों में कीमतों में तेज गिरावट भी देखी गई, जिसका कारण मुनाफावसूली और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थायी स्थिरता रहा। इस उतार-चढ़ाव ने भारतीय बाजार में असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। ग्राहक खरीद को टाल रहे हैं, जबकि व्यापारी सीमित स्टॉक के साथ काम करने को मजबूर हैं। निवेशक अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के होर्मुज प्लान और शांति वार्ता पर नजर रखे हुए हैं। तेल की बढ़ती कीमतों और अमेरिका में ब्याज दरों की अनिश्चितता के बीच गोल्ड का बाजार फिलहाल सतर्क लेकिन स्थिर जरूर दिखाई दे रहा है। ईरान - अमेरिका संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी हुई है, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ा है, तथा ऐसे में केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदें कम हो गई हैं, जो गोल्ड के लिए नकारात्मक संकेत माना जाता है क्योंकि गोल्ड ब्याज नहीं देता। इसी स्थिरता में संकेत ऊपर की ओर के ही हैं।
वैश्विक स्तर पर ज्वेलरी की मांग में नरमी भी इस संकट को गहरा कर रही है। अमेरिका और यूरोप जैसे बड़े बाजारों में उपभोक्ता खर्च दबाव में है, जिससे ज्वेलरी की बिक्री में गिरावट आई है। इसका सीधा असर भारत जैसे निर्यात-प्रधान देश पर पड़ता है, जहां लाखों कारीगर और व्यापारी इस उद्योग से जुड़े हैं। मांग कम होने से ऑर्डर घटे हैं, और उत्पादन पर भी असर पड़ा है। घरेलू स्तर पर स्थिति और जटिल हो जाती है। आम उपभोक्ता अब ज्वेलरी खरीदने के बजाय गोल्ड को निवेश के रूप में देख रहा है—चाहे वह सिक्के हों, बार हों या डिजिटल गोल्ड। ज्वेलरी में लगने वाले मेकिंग चार्ज और डिजाइन लागत के कारण उसकी आकर्षण क्षमता घट रही है। ज्वेलरी कारोबार में, यही वजह है कि सुस्ती साफ दिखाई दे रही है, जबकि बुलियन कारोबार अपेक्षाकृत स्थिर बना हुआ है। लेकिन इस पूरी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जो उम्मीद जगाता है। गोल्ड की बुनियादी ताकत अभी भी बरकरार है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता खत्म नहीं हुई है, महंगाई का दबाव बना हुआ है और केंद्रीय बैंक लगातार गोल्ड की खरीद बढ़ा रहे हैं। ये सभी संकेत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि गोल्ड में फिर से तेजी आ सकती है।
इतिहास भी यही बताता है कि गोल्ड लंबी अवधि में स्थिर और भरोसेमंद निवेश बना रहता है। ऐसे में सबसे जरूरी बात है - संयम। बाजार के हर उतार-चढ़ाव पर प्रतिक्रिया देना न तो निवेशकों के लिए सही है और न ही व्यापारियों के लिए। ज्वेलर्स को चाहिए कि वे अनावश्यक स्टॉक से बचें, हल्के और किफायती डिजाइन पर ध्यान दें और ग्राहकों के साथ पारदर्शिता बनाए रखें। वहीं निवेशकों को भी अल्पकालिक उतार-चढ़ाव से घबराने के बजाय दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। ज्वेलरी मार्केट क हर बिजनेसमेन ने हर तरह के दिन देखे हैं। तेजी भी देखी, तो मंदी में भी रहे हैं। ग्राहकों से भरे बाजारों की चमक - दमक भी देखी है, तो बाजारों में महीनों तक सन्नाटे का भी अनुभव किया है। इसलिए, वर्तमान के असमंडजस भरे हालात में 'आभूषण टाइम्स' का आप सभी से केवल यही कहना है कि यह समय घबराने का नहीं, बल्कि समझदारी से कदम उठाने का है। बाजार का स्वभाव ही उतार-चढ़ाव का है, लेकिन स्थिरता उसी को मिलती है, जो धैर्य रखता है। गोल्ड की चमक थोड़ी धुंधली जरूर हुई है, लेकिन उसकी मूल ताकत अभी भी कायम है और यही विश्वास आने वाले समय में बाजार की दशा और दिशा दोनों तय करेगा।










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