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डायमंड की चमक अभी बाकी है... सुधार में वक्त लगेगा!

  • Aabhushan Times
  • 1 day ago
  • 6 min read


दुनिया भर के ज्वेलर्स को डायमंड और डायमंड ज्वेलरी के हालात चिंताजनक लग रहे हैं, लेकिन डायमंड और डायमंड ज्वेलरी उद्योग अंत की ओर नहीं बढ़ रहे हैं, बल्कि बदलते आर्थिक दौर में यह उद्योग अपने आप को नए सिरे से गढ़ रहा है। क्योंकि डायमंड में चमक अभी बाकी है।

डायमंड और डायमंड ज्वेलरी का वैश्विक व भारतीय परिदृश्य चिंताजनक है? वर्तमान हालात में गोल्ड तथा सिल्वर दोनों ही बेतहाशा तेजी - मंदी के शिकार हैं, इस बीच डायमंड इंडस्ट्री भी मंदी की मार से जूझ रही है। डायमंड ज्वेलरी का एक्सपोर्ट बिजनेस घटा है, और इसके आने वाले सालों में कुछ और आगे बढऩे के तो कम है, लेकिन घटने के आसार जरूर हैं?  ऐसा माहौल में डायमंड बिजनेस और डायमंड ज्वेलरी की कम होती सेल के चिंताजनक हालात का तथ्यात्मक अध्ययन, विश्लेषणात्मक चिंतन और बाजार केंद्रित अवलोकन बेहद जरूरी है कि आखिर क्यों खत्म होता जा रहा है डायमंड और डायमंड ज्वेलरी का कारोबार?  हम देख रहे हैं कि डायमंड के बजाय मार्केट में लैब ग्रोन डायमंड और उसी से बनी ज्वेलरी का बोलबाला बढ़ता जा रहा है। डायमंड ज्वेलरी महंगी होने के कारण खरीदी कम होती जा रही है मगर लैब ग्रोन डायमंड, जिसे सामान्य बोलचाल की भाषा में बाजार में एलजीडी कहा जाता है, उस लैब ग्रोन डायमंड का तेजी से बढ़ता बाजार साल दर साल कितना बढ़ रहा है, तथा आगे कितना बढ़ेगा, यह भी जानने की जरूरत है। क्योंकि डायमंड उद्योग की चुनौती सेल की नहीं, वैल्यू की है। भारत डायमंड का सबसे बड़ा निर्माता और डायमंड ज्वेलरी का सबसे बड़ा निर्यातक भी। लेकिन वैश्विक खराब हालात में बाजार की हालत यह है कि दुनिया भर के लिए भारत से निर्यात घटता जा रहा है।  मुंबई, सूरत और देश के अन्य बाजारों में डायमंड और डायमंड ज्वेलरी के निर्माण व निर्यात पर सीधा नकारात्मक असर इसलिए भी है, क्योंकि गोल्ड व सिल्वर सहित वित्तीय बाजार भी नकारात्मक रुख में है। ऐसे, में सवाल केवल यही है कि आखिर कहां जाकर थमेगी डायमंड और डायमंड ज्वेलरी बिजनेस की ये धीमी रफ्तार, और फिर से तेजी के क्या आसार हैं, कोई स्पष्ट नहीं जान पा रहा है, यही सबसे बड़ी चिंता है? डायमंड ज्वेलरी उद्योग के बदलते आर्थिक समीकरण को देखते गुएअ लैब ग्रोन डायमंड के उभार के बीच भारत का तीन वर्षीय निर्यात परिदृश्य का अध्ययान करें, तो लगता है कि निकट भविष्य में, हालात सामान्य होने के आसार कम हैं। भारत का डायमंड और डायमंड ज्वेलरी उद्योग लंबे समय तक स्थिर विकास, मज़बूत वैश्विक मांग और निर्यात पर आधारित अर्थव्यवस्था का प्रतीक रहा है। डायमंड और डायमंड ज्वेलरी उद्योग में कटिंग - पॉलिशिंग से लेकर फाइन ज्वेलरी निर्माण तक, भारत ने न केवल वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में केंद्रीय भूमिका निभाई, बल्कि लाखों लोगों को रोजग़ार और देश को स्थायी विदेशी मुद्रा भी प्रदान की। परंतु बीते कुछ वर्षों में डायमंड और डायमंड ज्वेलरी उद्योग का यह स्थापित ढांचा एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। नेचुरल डायमंड और उससे बनी ज्वेलरी की मांग लगातार दबाव में है, वहीं लैब ग्रोन डायमंड तेज़ी से बाज़ार में अपनी जगह बना रहे हैं। यह परिवर्तन केवल उत्पाद का नहीं, बल्कि पूरे बिजनेस मॉडल और आर्थिक गणित का है। हम केवल भारत केंद्रित दृष्टिकोण से डायमंड ज्वेलरी उद्योग की मौजूदा स्थिति, लैब ग्रोन डायमंड के प्रभाव और आने वाले तीन वर्षों के निर्यात व राजस्व परिदृश्य का संक्षिप्त लेकिन ठोस आर्थिक विश्लेषण करें, तो साफ है कि हालात बेहद नाजुक हैं और भारत के डायमंड और डायमंड ज्वेलरी उद्योग से जुड़े लोगों को बेहद फूंख - फूंक कर कदम रखने की जरूरत है। 

भारत आज भी विश्व का सबसे बड़ा डायमंड कटपॉलिश केंद्र है। सूरत और मुंबई जैसे क्लस्टर वैश्विक डायमंड आपूर्ति श्रृंखला की रीढ़ माने जाते हैं। भारत के डायमंड और डायमंड ज्वेलरी उद्योग के औसत अनुमान को दखें, तो दुनिया के बाकी देशों की तुलना में भारत के डायमंड और डायमंड ज्वेलरी उद्योग की स्थिति बहुत शानदार है। हमारा कुल जेम्स एवं ज्वेलरी निर्यात लगभग 3 लाख 10 हजार करोड़ का है। जिसमें नेचुरल डायमंड व डायमंड ज्वेलरी का लगभग 2. 5 लाख करोड़ और बाकी का हिस्सा लैब ग्रोन डायमंड व ज्वेलरी का है। अर्थात, आज भी कुल निर्यात का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा नेचुरल डायमंड इकोसिस्टम से आता है। यही वह क्षेत्र है जो सबसे अधिक दबाव में है और जहां किसी भी गिरावट का असर पूरे उद्योग पर पड़ रहा है।

भारत का डायमंड और डायमंड ज्वेलरी उद्योग मूल रूप से नेचुरल डायमंड पर ही आधारित है। ऐसे में, नेचुरल डायमंड की घटती मांग भारत के लिए खतरे समान है। क्योंकि वैश्विक उपभोक्ता व्यवहार में बदलाव देखा जा रहा है। अमेरिका, चीन और यूरोप जैसे प्रमुख बाजारों में उपभोक्ता अब  बड़े कैरेट के बजाय छोटे और किफायती विकल्प चुन रहे हैं या फिर सीधे लैब ग्रोन डायमंड को स्वीकार कर रहे हैं। इसका सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ता है, ऑर्डर साइज घट रहे हैं, रिपीट ऑर्डर में देरी हो रही है जिससे स्टॉक होल्डिंग अवधि बढ़ती है, तो ब्याजा दरें भी नुकसान करती हैं। इसके अलावा मुख्य चुनौती है मूल्य दबाव और मार्जिन का लगातार कम होते जाना। नेचुरल डायमंड ज्वेलरी की उसी डिज़ाइन में लैब ग्रौन डायमंड ज्वेलरी के मुकाबले 40 से 60 फीसदी तक सस्ती पड़ती है। रिटेलर और ब्रांड इस अंतर को पूरी तरह उपभोक्ता पर स्थानांतरित नहीं कर पा रहे, नतीजतन एक्सपोर्ट प्राइस कम हो रहे हैं तथा निर्माता और ट्रेडर दोनों के मार्जिन घट रहे हैं। डायमंड और डायमंड ज्वेलरी उद्योग की यह स्थिति भारत जैसे निर्यातक देश के लिए विशेष चुनौतीपूर्ण है। लैब ग्रोन डायमंड अगर हमारे लिए एक अवसर है, तो एक अलग तरह की  चेतावनी भी है। हम मानते हैं कि लैब ग्रोन डायमंड ने भारत के सामने डायमंड और डायमंड ज्वेलरी उद्योग के लिए एक नया अवसर खोला है। लैब ग्रोन डायमंड की खासियत के नूल कारण ये हैं कि एक तो कम कच्चा माल रखने का जोखिम, दूसरा इसका  तेज़ उत्पादन और तीसरा है - कम वर्किंग कैपिटल। इसी कारण पिछले कुछ वर्षों में एलजीडी उत्पादन और निर्यात में तेज वृद्धि देखी गई है। परंतु यहां एक महत्वपूर्ण आर्थिक चेतावनी छिपी है। लैब ग्रोन डायमंड का गणित वॉल्यूम फ्रेंडली है, वैल्यू फ्रेंडली नहीं है। जैसे - जैसे लैब ग्रोन डायमंड का उत्पादन बढ़ता है, उसकी कीमतें गिरती जाती हैं। इसका अर्थ है कि निर्यात मात्रा बढऩे के बावजूद कुल राजस्व और विदेशी मुद्रा अर्जन सीमित रह सकता है।

भारतीय डायमंड और डायमंड ज्वेलरी उद्योग के बीते तीन वर्ष के भारत केंद्रित निर्यात परिदृश्य को देखें, तो यह पूर्ण रूप से नकारात्मक रहा है। नेचुरल डायमंड निर्यात में सालाना 10 से 12 फीसदी की गिरावट आई है, तो लैब ग्रोन डायमंड का भले ही तेज़ विस्तार हुआ है, लेकिन कीमतों में तीव्र गिरावट देखी जाती रही है। और सबसे खास बात ये है कि इसकी वैश्विक मांग में सुधार नहीं हो पा रहा है। इस परिदृश्य को हम यदि आने वाले तीन वर्षों के बाद के अनुमान में देखें, तो नेचुरल डायमंड निर्यात जो आज लगभग 1.90 हजार से 2 लाख लाख करोड़ का है, वह 3 साल में बढक़र 1.30 से लेकर 1.35 लाख करोड़ तक बढ़ सकता है। इसी तरह से लैब ग्रोन डायमंड का निर्यात 40 हजार करोड़ से बढक़र 85 से 90 हजार करोड़ तक जा सकता है। मतलब साफ है कि कुल डायमंड आधारित निर्यात में 35 से 40 हजार करोड़ की शुद्ध गिरावट देखी जा सकती है। इसका सीधा प्रभाव भारत के डायमंड ट्रेड में नकदी के संकट तथा छोटे व मध्यम यूनिट्स पर दबाव आने से सूरत और मुंबई जैसे क्लस्टर में रोजग़ार पर असर पड़ेगा। दूसरा परिदृश्य संतुलित है। जिसके बारे में माना जा रहा है कि नेचुरल डायमंड में 5 से 6 फीसदी की सीमित गिरावट आ सकता है, मगर और नेचुरल डायमंड और लैब ग्रोन डायमंड का समानांतर विकास भी संभव है। ऐसे हालात में, नेचुरल डायमंड निर्यात का1.50 से लेकर 1.60 लाख करोड और लैब ग्रोन डायमंड का बिजनेस 1 लाख करोड़  के पार भी जा सकता है। इसका परिणाम यह होगा कि भारतीय डायमंड और डायमंड ज्वेलरी उद्योग का आकार भले ही बना रहेगा, लेकिन मार्जिन कम और कंपीटिशन अधिक बढ़ाएगा। 

 असली मुद्दा यह है कि भारतीय डायमंड और डायमंड ज्वेलरी उद्योग में टर्न ओवर नहीं, वैल्यू जरूरी है। क्योंकि डायमंड उद्योग की चुनौती सेल की नहीं, वैल्यू की है। यदि भारत का निर्यात मॉडल केवल लैब ग्रोन डायमंड के वॉल्यूम पर आधारित हो गया, तो आंकड़ों में निर्यात बढ़ता दिखेगा लेकिन विदेशी मुद्रा अर्जन और उद्योग की आर्थिक मजबूती कमजोर होगी। भारतीय डायमंड और डायमंड ज्वेलरी उद्योग में नेचुरल डायमंड आज भी उच्च मूल्य, विरासत और निवेश केंद्रित उत्पाद है, जिसे कभी भी, कहीं भी और कैसे भी बाजार में चतारा जाए, उसकी वैल्यू मानी जाती है, जबकि लैब ग्रोम इस मामले में कहीं नहीं ठहरता। बदलते बाजार हालात में ज्वेलरी उद्योग के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता एक स्पष्ट और संतुलित रणनीति अपनाने की है, जिसमें नेचुरल और लैब ग्रोन डायमंड की भूमिकाएं अलग-अलग परिभाषित हों। नेचुरल डायमंड को प्रीमियम, विरासत और दीर्घकालिक मूल्य के प्रतीक के रूप में स्थापित करना होगा, जबकि लैब ग्रोन डायमंड को फैशन-उन्मुख, युवा उपभोक्ताओं और मास मार्केट की मांग से जोड़ा जाना चाहिए। इसके साथ ही उद्योग को केवल मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित रहने के बजाय डिज़ाइन, ब्रांडिंग और कहानी-निर्माण में निवेश कर ब्रांड-नेतृत्व की दिशा में आगे बढऩा होगा। 

वर्किंग कैपिटल पर सख्त अनुशासन कम उपलब्धता, तेज़ टर्नओवर और बेहतर कैश फ्लो आज की अनिश्चित परिस्थितियों में कारोबार को स्थिर रखने की सबसे बड़ी जरूरतें। साथ ही, पारंपरिक निर्यात बाजारों पर निर्भरता कम करते हुए नए उपभोक्ता सेगमेंट और उभरते बाजारों की तलाश करना भी अनिवार्य होगा। सही मायने में देखा जाए, तो डायमंड और डायमंड ज्वेलरी उद्योग किसी अंत की ओर नहीं बढ़ रहा, बल्कि वह अपने स्वरूप को नए सिरे से गढ़ रहा है। आने वाले तीन वर्ष भारत के लिए निर्णायक सिद्ध होंगे, जो बिजनेसमैन इस संक्रमण काल में व्यावहारिक और दूरदर्शी रणनीति अपनाएगा, वही स्थिरता और विकास की राह पर आगे बढ़ेगा, मगर जो केवल पुराने व्यापारिक मॉडल पर निर्भर रहेंगे, वे धीरे-धीरे खतेम होने की तरफ बढ़ेंगे। डायमंड की चमक अभी बाकी है, ज़रूरत सिफऱ् इतनी है कि उसे नए आर्थिक संदर्भों में देखा जाए और उसी अनुरूप संवारा जाए।




 
 
 

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