फीकी पड़ती डायमंड की चमक कटिंग और पॉलिशिंग इंडस्ट्री पर वैश्विक संकट
- Aabhushan Times
- 14 hours ago
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कभी विलासिता, समृद्धि और आकर्षण का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाने वाला डायमंड आज स्वयं अभूतपूर्व आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। कुछ वर्ष पहले तक दुनिया भर में हीरे की बढ़ती मांग ने भारत के डायमंड उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया था। विशेष रूप से गुजरात का सूरत शहर विश्व की डायमंड कैपिटल के रूप में जाना जाने लगा था। लेकिन बदलती वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक नीतियों, अमेरिका द्वारा लगाए गए भारी आयात शुल्क, वैश्विक मांग में कमी तथा वित्तीय संकट के कारण भारतीय डायमंड उद्योग की चमक फीकी पड़ती दिखाई दे रही है। इसका सबसे अधिक प्रभाव डायमंड कटिंग एवं पॉलिशिंग उद्योग तथा इससे जुड़े लाखों श्रमिकों और छोटे उद्यमियों पर पड़ा है। भारत स्वयं प्राकृतिक हीरों का बड़ा उत्पादक देश नहीं है, लेकिन पिछले कई दशकों से वह दुनिया का सबसे बड़ा डायमंड प्रोसेसिंग हब बना हुआ है। विश्व के अधिकांश रफ (कच्चे) डायमंड भारत में आयात किए जाते हैं, जहां उन्हें अत्याधुनिक तकनीक और कुशल श्रमिकों की सहायता से काटकर, तराशकर तथा पॉलिश कर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात किया जाता है। हालांकि पिछले कुछ महीनों में स्थिति में धीरे-धीरे सुधार के संकेत दिखाई देने लगे हैं। फरवरी 2026 में भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौता हुआ। यद्यपि इसके तुरंत बाद पश्चिम एशिया में युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण वैश्विक व्यापार प्रभावित हुआ, फिर भी भारत और अमेरिका के बीच हुए समझौते ने उद्योग को नई उम्मीद दी।
वर्तमान समय में विश्व के लगभग 80 प्रतिशत डायमंड की कटिंग और पॉलिशिंग भारत में होती है। यही कारण है कि भारत का डायमंड उद्योग वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। भारत सरकार द्वारा आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाने के बाद डायमंड निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। लगभग एक दशक पहले भारत के कुल कमोडिटी निर्यात में डायमंड उद्योग की हिस्सेदारी लगभग 18 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। उस समय भारत से तैयार कट एवं पॉलिश किए गए हीरों का लगभग 25 प्रतिशत अमेरिका, 25 प्रतिशत हांगकांग, 10 प्रतिशत बेल्जियम, 5 प्रतिशत इजरायल तथा लगभग 2 प्रतिशत जापान और थाईलैंड को निर्यात किया जाता था। इन देशों में तैयार किए गए डायमंड ज्वेलरी उत्पादों का एक बड़ा हिस्सा पुन: अमेरिकी बाजार में पहुंचता था। इस प्रकार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका भारतीय डायमंड उद्योग का सबसे बड़ा उपभोक्ता रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में आए बदलावों ने इस पूरे उद्योग की नींव को हिला दिया। दुनिया के कई देशों में आर्थिक मंदी, महंगाई, उपभोक्ता खर्च में कमी तथा लग्जरी उत्पादों की घटती मांग ने डायमंड उद्योग को गहरा झटका दिया। इसका सबसे बड़ा असर भारत के निर्यात पर पड़ा, क्योंकि भारतीय उद्योग की आय का बड़ा हिस्सा विदेशी बाजारों पर निर्भर करता है।.
साल 2025 भारतीय डायमंड उद्योग के लिए सबसे कठिन वर्षों में से एक साबित हुआ। अमेरिकी सरकार ने भारत से आयात होने वाले कट एवं पॉलिश किए गए डायमंड पर आयात शुल्क (टैरिफ) बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया। इस निर्णय ने भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित किया। अमेरिकी आयातकों के लिए भारतीय डायमंड महंगे हो गए, जिसके कारण ऑर्डर तेजी से घटने लगे। परिणामस्वरूप भारत से अमेरिका को होने वाला डायमंड निर्यात 60 प्रतिशत से अधिक कम हो गया। जो निर्यात पहले लगभग 10 अरब डॉलर के आसपास था, वह घटकर लगभग आधा रह गया। भारतीय कट एवं पॉलिश किए गए डायमंड के कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी, जो पहले लगभग ३5 से 40 प्रतिशत थी, घटकर केवल 15 से 16 प्रतिशत रह गई।
वैश्विक स्तर पर डायमंड उद्योग एक जटिल मूल्य श्रृंखला (वैल्यू चेन) के रूप में कार्य करता है। इसकी शुरुआत डायमंड के अन्वेषण और खनन से होती है। इसके बाद छंटाई, कटिंग एवं पॉलिशिंग, ज्वेलरी निर्माण तथा अंत में खुदरा बिक्री (रिटेल) तक की लंबी प्रक्रिया होती है। प्राकृतिक डायमंड का खनन मुख्य रूप से दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया, बोत्सवाना, कांगो, अंगोला, रूस, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में किया जाता है। वहां से प्राप्त रफ डायमंड को आकार, गुणवत्ता, रंग और वजन के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है तथा किम्बर्ली प्रोसेस सर्टिफिकेट के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भेजा जाता है। इसके बाद ये डायमंड भारत जैसे देशों में पहुंचते हैं, जहां बड़ी संख्या में कुशल कारीगर इन्हें काटने और चमकाने का कार्य करते हैं। भारत इस प्रक्रिया का प्रमुख केंद्र इसलिए बन पाया क्योंकि यहां श्रम अपेक्षाकृत सस्ता है और बड़ी संख्या में प्रशिक्षित कारीगर उपलब्ध हैं। विशेष रूप से गुजरात में दशकों से लाखों परिवार इस उद्योग से जुड़े हुए हैं। कम लागत, उच्च गुणवत्ता और विशाल कार्यबल ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा डायमंड प्रोसेसिंग केंद्र बना दिया। हालांकि, मूल्य श्रृंखला में सबसे अधिक लाभ ज्वेलरी निर्माण और खुदरा बिक्री से प्राप्त होता है। कुल मूल्य का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा इन दोनों चरणों में जुड़ता है, जबकि कटिंग और पॉलिशिंग का योगदान केवल लगभग 8 प्रतिशत मूल्य तक सीमित रहता है। इसका अर्थ यह है कि भारत वैश्विक डायमंड उद्योग की मूल्य श्रृंखला के निचले स्तर पर कार्य करता है, जबकि डी बीयर्स, अलरोसा, रियो टिंटो और अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियां ऊपरी स्तर पर अधिक लाभ अर्जित करती हैं।
भारत की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह कच्चे डायमंड के लिए भी वैश्विक बाजारों पर निर्भर है और तैयार उत्पादों की बिक्री के लिए भी विदेशी ग्राहकों पर निर्भर रहता है। जब वैश्विक बाजारों में मांग घटती है, तब इसका सीधा प्रभाव भारतीय उद्योग पर पड़ता है। वित्तीय संकट के दौरान विदेशी खरीदारों ने नए ऑर्डर कम कर दिए, जिसके कारण हजारों इकाइयों में उत्पादन घटाना पड़ा। कई छोटे एवं मध्यम उद्योग पूरी तरह बंद हो गए। इस संकट का दूसरा महत्वपूर्ण कारण पूंजी की उपलब्धता में कमी रहा। वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के कारण विदेशी निवेश में कमी आई तथा पूंजी का बहिर्वाह बढ़ा। परिणामस्वरूप बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा छोटे उद्योगों को ऋ ण उपलब्ध कराना कठिन हो गया। डायमंड उद्योग, विशेष रूप से छोटे उत्पादक, कार्यशील पूंजी की भारी कमी से जूझने लगे। कच्चा माल खरीदने, मजदूरी देने और उत्पादन जारी रखने में अनेक इकाइयों को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। तीसरा प्रमुख कारण भारतीय रुपये का अवमूल्यन रहा। भारत अपने अधिकांश रफ डायमंड विदेशों से आयात करता है। जब रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले कमजोर होती है, तब आयातित कच्चे डायमंड की लागत बढ़ जाती है। इससे उत्पादन लागत में वृद्धि होती है और निर्यातकों के लिए प्रतिस्पर्धा करना और कठिन हो जाता है। बढ़ती लागत तथा घटती मांग के बीच उद्योग का लाभ लगातार कम होता गया। भारत में डायमंड कटिंग एवं पॉलिशिंग का लगभग 90 प्रतिशत कार्य गुजरात में होता है। सूरत विश्व का सबसे बड़ा डायमंड प्रोसेसिंग केंद्र माना जाता है। इसके अलावा भावनगर, अमरेली, राजकोट, पोरबंदर, जूनागढ़, बनासकांठा, साबरकांठा, मेहसाणा तथा पाटन जैसे जिले भी इस उद्योग के प्रमुख केंद्र हैं। दूसरी ओर मुंबई अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निर्यात, आयात और विपणन का सबसे बड़ा केंद्र है। इसलिए जब डायमंड उद्योग में संकट आया, तब इसका सबसे अधिक प्रभाव गुजरात और मुंबई की अर्थव्यवस्था पर पड़ा। सूरत में लाखों श्रमिक डायमंड कटिंग और पॉलिशिंग के कार्य से जुड़े हुए हैं। अमेरिका तथा अन्य देशों से ऑर्डर कम होने के कारण अनेक फैक्ट्रियों को उत्पादन घटाना पड़ा। हजारों छोटे कारखाने बंद हो गए और लाखों श्रमिकों के सामने रोजगार का संकट उत्पन्न हो गया। बड़ी संख्या में कारीगरों को अपने गांव लौटना पड़ा या वैकल्पिक रोजगार की तलाश करनी पड़ी। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था, व्यापार, परिवहन, आवास तथा अन्य सेवाओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। डायमंड उद्योग में छोटे और मध्यम उद्यम सबसे अधिक प्रभावित हुए। बड़ी कंपनियों के पास पूंजी, विदेशी संपर्क तथा बाजार विविधीकरण की क्षमता होती है, जबकि छोटे उत्पादक सीमित संसाधनों पर निर्भर रहते हैं। ऑर्डर घटने, कच्चे माल की बढ़ती कीमतों तथा वित्तीय संकट के कारण अनेक छोटे उद्यम पूरी तरह बंद हो गए।
हालांकि डायमंड सुधार के संकेत दिखाई देने लगे हैं। फरवरी बिजनेस के परिदृश्य में अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते के तुरंत बाद पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण वैश्विक व्यापार प्रभावित हुआ, फिर भी भारत और अमेरिका के बीच हुए समझौते ने उद्योग को नई उम्मीद दी है। इस समझौते के तहत डायमंड पर लगाए गए 50 प्रतिशत आयात शुल्क को पहले घटाकर 18 प्रतिशत किया गया तथा अब इसे पूरी तरह समाप्त करने पर भी बातचीत जारी है। जून 2026 में हुई हालिया बैठकों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में सकारात्मक माहौल बनने लगा है। भारतीय निर्यातकों ने भी केवल अमेरिकी बाजार पर निर्भर रहने के बजाय अपने निर्यात बाजारों का विस्तार करना शुरू कर दिया है। संयुक्त अरब अमीरात, यूरोपीय संघ तथा अन्य उभरते बाजारों में भारतीय डायमंड की मांग बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इससे भविष्य में अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता कम होने की संभावना है। यदि यह रणनीति सफल होती है, तो भारतीय डायमंड उद्योग अधिक स्थिर और प्रतिस्पर्धी बन सकता है। भविष्य की दृष्टि से यह आवश्यक है कि भारत केवल कटिंग और पॉलिशिंग तक सीमित न रहे, बल्कि ज्वेलरी निर्माण, ब्रांडिंग, डिजाइनिंग और वैश्विक खुदरा बाजार में भी अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए। इससे मूल्य श्रृंखला के ऊपरी स्तर पर अधिक लाभ अर्जित किया जा सकेगा। साथ ही आधुनिक तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित ग्रेडिंग, उच्च गुणवत्ता प्रशिक्षण और नए निर्यात बाजारों के विकास पर भी विशेष ध्यान देना होगा। श्रमिकों के कौशल विकास तथा छोटे उद्योगों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराकर इस क्षेत्र को अधिक मजबूत बनाया जा सकता है।











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