top of page

सिल्वर फिर पकड़ेगा 4 लाख की राहविश्वास और अविश्वास के बीच झूलता मेटल बन गया सिल्वर

  • Aabhushan Times
  • 1 day ago
  • 7 min read

सिल्वर का वैश्विक व भारतीय परिदृश्य चिंताजनक है। इसके तथ्यात्मक, विश्लेषणात्मक और बाजार केंद्रित अध्ययन के प्रत्येक बिंदु को स्वतंत्र तरीके से देखें तो सिल्वर फिर से 4 लाख की तेजी पकड़ सकता है। सिल्वर ज्वेलरी के व्यापार, निवेशकों की प्रवृत्ति और सिल्वर के खनन जैसे तीनों के दृष्टिकोण से स्थिति स्पष्ट है कि सिल्वर फिर से तेजी पकड़ेगा।


वर्तमान समय में सिल्वर वैश्विक कमोडिटी बाजार की सबसे अधिक अस्थिर धातुओं में शामिल हो चुकी है। एक ओर इसे सुरक्षित निवेश विकल्प माना जाता है, वहीं दूसरी ओर सिल्वर की असुरक्षा का भाव जगा रहा है। हालांकि सिल्वर को भी आम तौर पर गोल्ड की तरह एक प्रीशियस मेटल ही माना जाता रहा है, लेकिन का औद्योगिक उपयोग इसे गोल्ड से अलग स्थिति पिरदान करता है। सोलर एनर्जी, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, सेमीकंडक्टर और मेडिकल इंडस्ट्री में सिल्वर की मांग लगातार बढ़ रही है। इसी कारण वैश्विक निवेशक इसे केवल ज्वेलरी मेटल नहीं, बल्कि ग्रीन मेटल के रूप में देखने लगे हैं। हालांकि, यही दोहरी भूमिका इसकी कीमतों में तीव्र उतारचढ़ाव का मुख्य कारण भी है। जब ब्याज दरों में बदलाव, डॉलर की मजबूती या राजनीतिक तनाव जैसै वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता के कारण बढ़ते हैं, तो निवेशक तेजी से सिल्वर में प्रवेश करते हैं, जिससे कीमतें उछल जाती हैं। इसके विपरीत, जैसे ही मुनाफा वसूली या आर्थिक स्थिरता के संकेत मिलते हैं, रेट्स अचानक नीचे आ जाते हैं। आने वाले महीनों में यदि अमेरिका और यूरोप में ब्याज दरों में कटौती होती है और सोलर सेक्टर की मांग बनी रहती है, तो इंटरनेशनल मार्केट में सिल्वर दोबारा ऊपरी स्तरों की ओर जा सकता है। बाजार के जानकारों तथा सिल्वर सेक्टर के विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर सिल्वर अभी भी एक हाई रिस्क - हाई रिटर्न कमोडिटी बनी हुई है, जहां स्थायी तेजी तभी संभव है जब औद्योगिक मांग और निवेश दोनों संतुलन में रहें।

जनवरी के अंत में भारतीय बाजार में सिल्वर ने जब 4 लाख 15 हजार रुपये प्रति किलो का ऐतिहासिक शिखर छुआ, तब यह तेजी केवल मांग का परिणाम नहीं थी, बल्कि सट्टेबाजी और भावनात्मक निवेश का भी असर था। अचानक आई इस तेजी ने व्यापारियों और निवेशकों, दोनों को चौंका दिया। ज्वेलर्स ने ऊंचे दामों पर स्टॉक लेने से परहेज किया, जबकि निवेशकों में और ऊपर जाएगा की धारणा बनी रही। लेकिन इसके तुरंत बाद जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में मुनाफावसूली शुरू हुई और डॉलर मजबूत हुआ, तो भारतीय बाजार में सिल्वर तेजी से फिसलकर 2 लाख 40 हजार रुपये प्रति किलो के स्तर पर आ गया। यह गिरावट केवल रेट की नहीं, बल्कि भरोसे की भी थी। जो निवेशक ऊंचे स्तर पर खरीदी कर चुके थे, वे असमंजस में आ गए और बाजार में सतर्कता बढ़ गई। इस उतारचढ़ाव के बाद भारतीय सिल्वर बाजार फिलहाल 'वेटएंडवॉच' मोड में है। ट्रेडर्स सीमित सौदे कर रहे हैं, ज्वेलर्स न्यूनतम स्टॉक पर काम चला रहे हैं और ग्राहक खरीदी टाल रहे हैं। बाजार में यह भावना गहराई है कि जब तक सिल्वर कुछ समय तक एक सीमित दायरे में स्थिर नहीं होता, तब तक वास्तविक मांग लौटना मुश्किल है।

क्या सिल्वर फिर से 4 लाख रुपये प्रति किलो की तेजी पकड़ेगा? यह सवाल आज हर निवेशक, हर ज्वेलर और हर कारोबारी के मन में है। हाल के महीनों में सिल्वर ने जिस तरह 4 लाख 15 हजार रुपये प्रति किलो के ऐतिहासिक स्तर को छुआ और फिर तेजी से नीचे आया, उसने बाजार में भरोसे और अविश्वास—दोनों को जन्म दिया है। वास्तविकता यह है कि सिल्वर में दोबारा उस स्तर तक पहुंचने की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन यह तेजी तत्काल नहीं होगी। वैश्विक स्तर पर सिल्वर के औद्योगिक उपयोग ने इसे रणनीतिक धातु बना दिया है। यदि आने वाले समय में औद्योगिक उपयोग में वैश्विक निवेश और तेज होता है, तो सिल्वर की औद्योगिक मांग लगातार बढ़ेगी। यही वह आधार है, जो लंबी अवधि में कीमतों को सहारा दे सकता है। लेकिन 4 लाख रुपये प्रति किलो की तेजी तभी टिकाऊ होगी, जब वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता बढ़े, ब्याज दरों में नरमी आए और निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर लौटें। वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल रहीं, तो 2026 के मध्य से अंत तक सिल्वर फिर से ऊपरी स्तरों की ओर बढ़ सकता है। लेकिन यह तेजी अचानक उछाल के रूप में नहीं होगी। भारतीय बाजार में रेट्स का स्थिर रहना भी जरूरी है, क्योंकि घरेलू मांग तभी लौटेगी जब खरीदारों को भरोसा होगा।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में सिल्वर के रेट्स में तेज उछाल का मुख्य कारण औद्योगिक मांग के साथ - साथ वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता रही है। अमेरिका और यूरोप में मंदी की आशंका, एनर्जी ट्रांजिशन और निवेशकों का कीमती धातुओं की ओर झुकाव जैसे इन सब कारणों ने मिलकर सिल्वर को तेजी दी। लेकिन जैसे ही ब्याज दरों में स्थिरता और आर्थिक आंकड़ों में सुधार के संकेत मिलते ही, निवेशकों ने मुनाफा निकालना शुरू कर दिया। सिल्वर की गिरावट का एक बड़ा कारण यह भी है कि यह गोल्ड की तुलना में अधिक संवंदनशील धातु है, जिस पर सट्टा ज्यादा चलता है। बड़े फंड्स जब सिल्वर से बाहर निकलते हैं, तो उसकी कीमतें तेजी से नीचे आती हैं। मानाज जा रहा है कि सिल्वर में स्थिरता तभी आएगी जब वैश्विक आपूर्ति और मांग का संतुलन स्पष्ट होगा और साथ ही केंद्रीय बैंकों की नीतियां स्पष्ट दिशा में जाएंगी। साल 2026 के अंत तक, यदि सोलर और इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर की मांग मौजूदा रफ्तार से बढ़ती रही, तो भारत में सिल्वर फिर से 3.50 से 4.00 लाख रुपये प्रति किलो के दायरे तक फिर पहुंच सकता है। हालांकि यह वृद्धि धीरे - धीरे और चरणबद्ध होगी, न कि पिछली बार के अचानक उछाल के रूप में दिखेगी।

सिल्वर की वैश्विक खरीददारी के साथ साथ दुनिया भर के देशों में आई आर्थिक अस्थिरता और सिल्वर की सीमित उपलब्धता का असर बाजार पर सीधी पड़ा है। लेकिन सिल्वर पर सबसे बड़ा प्रभाव वैश्विक खरीददारी और सीमित उपलब्धता का है। सिल्वर का उत्पादन गोल्ड की तरह स्वतंत्र नहीं है। सिल्वर आम तौर पर कॉपर, जिंक और सीसा की खदानों से निकले खनीज के सहयोगी उत्पाद के रूप में निकलता है। ऐसे में यदि बेस मेटल्स का उत्पादन घटता है, तो सिल्वर की सप्लाई अपने आप सीमित हो जाती है। दूसरी ओर, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के समय निवेशक सिल्वर को सुरक्षित विकल्प के रूप में देखते हैं। इससे मांग अचानक बढ़ जाती है, लेकिन सप्लाई तुरंत नहीं बढ़ पाती। यही असंतुलन कीमतों को ऊपर ले जाता है। पिछले कुछ वर्षों में यही ट्रेंड बारबार देखने को मिला है। यदि आने वाले समय में खनन उत्पादन में ठोस वृद्धि नहीं होती और औद्योगिक मांग बनी रहती है, तो सिल्वर की उपलब्धता एक बड़ा मुद्दा बन सकती है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे स्ट्रक्चरल सप्लाईडेफिसिट मेटल मानने लगे हैं। सिवल्वर की तेजी - मंदी का ज्वेलरी बाजार पर गहरा असर हुआ है और ज्वेलर्स की चिंता भी बेहद वाजिब है,, क्योंकि उनका व्यापार बेहद धीमा हो चला है। सिल्वर के तेज उतार - चढ़ाव ने ज्वेलरी बाजार में अस्थिरता पैदा कर दी है। ग्रामीण भारत, जहां विवाह सीजन में सिल्वर ज्वेलरी की मजबूत मांग रहती है, वहां भी इस बार ग्राहकी कमजोर रही। ऊंचे और अस्थिर रेट्स ने ग्राहकों को खरीदी टालने पर मजबूर किया है। ज्वेलर्स के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे न तो ऊंचे रेट्स पर स्टॉक लेना चाहते हैं, न ही गिरावट के डर से बड़े ऑर्डर दे पा रहे हैं। नतीजतन, बाजार में कारोबार सिमट गया है। छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में यह असर ज्यादा दिख रहा है। ज्वेलरी सेक्टर का मानना है कि जैसे ही सिल्वर के रेट कुछ महीनों तक स्थिर रहते हैं, ग्राहकों का भरोसा लौटेगा और खरीदी में सुधार आएगा। फिलहाल पूरा सेक्टर प्रतीक्षा की स्थिति में है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आने वाले वक्त में भारत में सिल्वर फिर से कितना महंगा हो सकता है या क्या फिर से सस्ता हो सकता है, इस लिहाज से सिल्वर भारतीय ग्रामीण इलाकों के जममानस की घरेलू अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा महत्व रखता है। भारत में सिल्वर न केवल ज्वेलरी, बल्कि निवेश, उद्योग और सांस्कृतिक परंपराओं से भी जुड़ा है। यदि वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल रहीं, तो सिल्वर के रेट आगे चलकर ऊपरी स्तरों को छू सकते हैं। वहीं, यदि वैश्विक मंदी गहराती है और औद्योगिक मांग घटती है, तो इसमें और गिरावट भी संभव है। भारतीय अर्थव्यवस्था में सिल्वर का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह ग्रामीण आय, कुटीर उद्योग और छोटे व्यापारियों से जुड़ा हुआ है। बाजार की स्थिरता केवल निवेशकों के लिए नहीं, बल्कि रोजगार और पारंपरिक व्यापार के लिए भी जरूरी है। हालांकि, सिल्वर आज भरोसे और अविश्वास के बीच झूलती धातु बन चुकी है। इसकी वैश्विक मांग मजबूत है, लेकिन अस्थिर रेट्स ने भारतीय बाजार में सतर्कता पैदा कर दी है। जब तक कीमतों में स्थिरता नहीं आती, तब तक ज्वेलरी और निवेश—दोनों ही क्षेत्रों में सीमित गतिविधि बनी रहेगी। दीर्घकाल में सिल्वर का भविष्य सकारात्मक है, पर अल्पकाल में सावधानी ही सबसे बेहतर रणनीति है।












राहुल मेहता - सिल्वर एम्पोरियम

वैश्विक बाजार में सिल्वर की तेज चाल और बार-बार गिरावट ने भारतीय बाजार में भरोसे को कमजोर किया है। निवेशक और ज्वेलर्स दोनों असमंजस में हैं। एक ओर औद्योगिक मांग मजबूत है, तो दूसरी ओर अस्थिर रेट्स डर पैदा कर रहे हैं। यही वजह है कि खरीदी में सावधानी और प्रतीक्षा का माहौल बना हुआ है।











विनय शोभावत - आनंद दर्शन सिल्वर्स

भारत में सिल्वर ज्वेलरी का कारोबार सीधे रेट्स की स्थिरता पर निर्भर करता है। अचानक उछाल और तेज गिरावट से ग्राहक निर्णय टाल रहे हैं। ग्रामीण भारत का ज्वेलरी बाजार, जो सिल्वर का मजबूत आधार है, वहां भी विश्वास डगमगाया है। जब तक भाव एक दायरे में नहीं टिकते, तब तक कारोबार दबाव में रहेगा।












अमन सिंघवी - अरिहंत ९२५ ज्वेलरी प्रा. लि.

तेजी से बदलते वैश्विक संकेतों ने सिल्वर को सकारात्मक धातु के रूप में स्थापित कर दिया है। इससे भारतीय बाजार में अविश्वास बढ़ा है। ज्वेलर्स सीमित स्टॉक रख रहे हैं और निवेशक छोटे सौदे कर रहे हैं। बाजार फिलहाल लाभ नहीं, बल्कि जोखिम प्रबंधन की सोच के साथ चल रहा है।












भावना बड़ोला - वर्धमान ९२५ सिल्वर ज्वेलरी

सिल्वर ज्वेलरी बिजनेस आज संक्रमणकाल से गुजर रहा है। ऊंचे और अस्थिर रेट्स ने मांग को कमजोर किया है। ग्राहक भाव स्थिर होने का इंतजार कर रहे हैं। जैसे ही बाजार में भरोसा लौटेगा और कीमतें संतुलित होंगी, वैसे ही सिल्वर ज्वेलरी की पारंपरिक चमक फिर लौट सकती है।



 
 
 

Comments


Top Stories

Bring Jewellery news straight to your inbox. Sign up for our daily Updates.

Thanks for subscribing!

  • Instagram
  • Facebook

© 2035 by Aabhushan Times. Powered and secured by Mayra Enterprise

bottom of page